ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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हुएँ भी हम जी नहीं सकते । अतएव प्रत्येक स्त्री पुरुष को चाहिये कि वह शरीर की स्वच्छता में कभी आलस्य न करे, धर्पण-स्नान रोज किया करे । धर्पण-स्नान से त्वचा के सब छिद्र खुल जाने के कारण भीतर के असंख्य दूषित पदार्थ पसीने के रूप में बड़ी आसानी से बाहर निकल जाते हैं और बाहर की शुद्ध हवा भीतर जाने से शरीर निरोग बन जाता है । धर्पण-स्नान से मनुष्य अधिक तेजस्वी, निरोग, निर्विकारी, ब्रह्मचारी और दीर्घजीवी सहज में बन सकता है; और गन्दापन से वह रोगी, विकारी, आलसी, विपयी और अस्पायु बन जाता है । सब जगह पवित्रता ही जीवन है व अपवित्रता ही मृत्यु है । हम लोग अक्सर काक-स्नान ( कौआ-स्नान ) किया करते हैं । शिर पर १०—५ लोटे पानी डाल लिये और हो गया स्नान ! शरीर मलने से कुछ मतलब नहीं । लेखक ने तो एक मनुष्य को केवल एक ही लोटे पानी में स्नान करते हुए देखा है । यह बहुत ही बुरा है । नतीजा यह होता है कि, शरीर में का जहर बाहर नहीं निकलने पाता । पाखाना साफ नहीं होता है, जठराग्नि मन्द होने से खाना भी नहीं पचता, सदा अपच हुआ करता है । फिर भीतर के जहर को परम दयालु प्रकृति माता खुजली, दाद, फोड़ों के रूपों में शरीर के बाहर निकालने लगती है । रोग प्रकृति की स्पष्ट सूचनायें हैं और मनुष्य की दुर्गुप्तगी के अन्तिम इलाज हैं । इतने पर भी मनुष्य होश में न आये तो द्वार में इन्तजार करती हुई मृत्यु उसे चट से अपनी गोद में ले लेती है ।
धर्पण-स्नान की शास्त्रीय विधि:—स्नानके लिये प्रातःकाल सबसे अच्छा समय है । प्रातःस्नान से सब दिन बड़े आनन्द से बीतता