भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 199 में से

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“घर्षण-स्नान”

नियम छटा:—

वक्तव्य:—ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये मन का और वाणी का पवित्र रहना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि गन्दे शरीर से मन भी गन्दा बन जाता है। गन्दगी रोग का घर है। जो पुरुष रोगी है वह कभी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। पुनः रोगी शरीर से दीन और दुनियां दोनों डूब जाते हैं। अतः शरीर को सदा शुद्ध व बलिष्ठ बनाये रखना प्राणि मात्र का सब से प्रथम और मुख्य कर्तव्य है।

एक समय हमारी तरफ एक मनुष्य मोहरूम में शेर बनाया गया था। शरीर में वारनिश मिलाया हुआ पीला रंग सर्वत्र पोंत दिया गया था। दिन भर खेला-कूदा और रात को घर लौटा। थकावट के कारण जल्दी सो गया। सूर्योदय हुआ। ८-९ बजने पर भी नहीं उठा, तब लोग घबड़ा गये। पुकारने पर भी जब नहीं बोला तब लोगों ने किवाड़ तोड़ डाले और क्या देखते हैं कि वह मुर्दे की तरह अचल पड़ा है। तुरन्त डाक्टर को बुलाया। डाक्टर ने आते ही फौन उस शेर को टारपेन तेल, गरम पानी और साबुन से खूब रगड़ कर साफ किया। जब उस मनुष्य का शरीर स्वच्छ हुआ, चमड़े के सब छिद्र जब साफ खुल गये, तब कहीं १५ मिनट के बाद उसने गहरी सांस ली और आँखें खोलीं। अन्त में वह चंगा हो गया। इस दृष्टान्त से यह सिद्ध हुआ है कि नाक और मुँह से भी हमारे शरीर का चमड़ा कहीं अधिक साँस लेता है। चमड़े के छिद्र बन्द होने से नाक और मुँह खुले रहते