ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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गीता वा रोमयण का पाठ करना अत्यन्त उपकारी होगा। ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये योगवाशिष्ठ, वैराग्यमुमुक्षुप्रकरण, उपदेशरत्नाकर, ज्ञान वैराग्य प्रकाश, श्रीरामकृष्ण, शंकराचार्यकृत प्रश्नोत्तरमणिमाला, दासबोध,—ये पुस्तकें अति ही उपकारी हैं। इनका नित्य पाठ करना चाहिये। जैसे एक ही अन्न और जल रोज़ खाया और पिया जाता है, वैसे ही जो कुछ पढ़ा है उसे ही बराबर पढ़ना और उसका खूब मनन करना चाहिये, इसी में हमारा उद्धार है।
उपन्यासः—उपन्यासादि शृङ्गार रसपूर्ण ग्रन्थ पढ़ना मानों अपने हाथ अपने मकान में दियासलाई लगाना है। शृङ्गारी पुस्तकें बड़े ब्रह्मचारी को भी व्यभिचारी बना देती हैं, अच्छे अच्छे सच्चरित्र बालक बालकायें भी कुग्रन्थों के पठन और श्रवण से दुश्चरित्र बन गयी हैं। अतः कुग्रन्थों का सर्वदा त्याग करो, अच्छे ग्रन्थों का पता अपने सुमित्रों और भाइयों से पूछो। मूर्खता से कोई कुग्रन्थ न पढ़ बैठो। कुग्रन्थ पढ़ना और विष खा लेना दोनों समान है अतः जिन्हें नोच पुरुष न बनना हो, जिन्हें महापुरुष बनना हो, उन्हें चाहिये कि वे आग्रहपूर्वक महापुरुषों के चरित्र-ग्रन्थ पढ़ें।
चरित्र-ग्रन्थः—चरित्र ग्रन्थों के पढ़ने से बड़े बड़े पापात्मा भी पुण्यात्मा बन गये हैं। सुदों में भी जीवन फूँक देते हैं, महापुरुष के चरित्र-ग्रन्थ इस लोक के लिये चैतन्यामृत हैं। अतः जो अपना उद्धार चाहते हैं वे नित्य-प्रति धर्म-ग्रन्थ नीति-ग्रन्थ चरित्र-ग्रन्थ आदि पढ़ें पढ़ाये, सुने, सुनाये क्योंकि सद्ग्रन्थ ही धार्मिक-जीवन का भोजन है। सद्ग्रन्थ ही इस लोक के तारक मंत्र हैं। और कुग्रन्थ ही काल के सारक यंत्र हैं।