भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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“सद्ग्रन्थावलोकन”

नियम पाँचवाँ :—

वक्तव्यः—जहाँ सन्मित्र व सज्जन-संगति दुर्लभ हो वहाँ सद्ग्रन्थ-रूपी सज्जनों और मित्रों की संगति करन चाहिए। सद्ग्रन्थों द्वारा हम संसार के एक से एक महात्मा की संगति रात-दिन कर सकते हैं और उनसे जब चाहें तब तथा जितने मरतबे चाहें उतने मरतबे वार्तालाप कर सकते हैं और अपना ‘यथेष्ट’ समाधान कर सकते हैं। “सद्ग्रन्थ इस लोक के चिन्तामणि हैं। सद्ग्रन्थों के पठन-पाठन से सब कुचिन्तार्यें मिट जाती हैं, संशय-पिशाच भाग जाते हैं और मन में सद्भाव जागृत होकर परम शांति प्राप्त होती है। ज्ञानाग्नि से मनुष्य का सब पाप जल जाता है और मनुष्य पापात्मा से पुण्यात्मा और व्यभिचारी से ब्रह्मचारी बन जाता है। ज्ञानानन्द के सामने विषयानन्द फीका पड़ जाता है। बिना सिद्धान्त-वाक्यों के श्रवण किये किसी का आचरण कदापि शुद्ध नहीं हो सकता। श्रवण की महिमा अपरम्पार है। बिना देखे और सुने किसी का उद्धार आज तक न हुआ है, न होगा।

अतः हमें रोज़ प्रातःकाल और सायंकाल किसी पवित्र ग्रन्थ का पवित्रता और एकग्रतापूर्वक, शुद्ध जगह पर बैठ कर, थोड़ा ही नियमित पाठ करने का नियम बांध लेना चाहिये। पाठ को शान्ति और प्रसन्नता-पूर्वक पूरा किये बिना अत्र ग्रहण नहीं करेंगे—ऐसा एक निश्चय कर लेना चाहिये। इस प्रकार निश्चय कर लेने से मनुष्य के भीतर एक अद्भुत देवी शक्ति जागृत होती है, जो कि उसे उन्नति के शिखर पर पहुँचा देती है।