ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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[ ८७ ]
नष्ट करने वाला परमात्मा का ही शुभचिन्तन व ध्यान हमेशा करें। वस, फिर तुम महात्मा ही हो और तुम्हें यहीं पर सच्चा स्वर्ग है।
एक समय भगवान् विष्णु ने राजा बलि से पूछा कि “तुम सज्जनों के साथ नरक में जाना पसन्द करोगे या दुर्जनों के साथ स्वर्ग में ?” बलि ने तत्काल उत्तर दिया कि “मैं सज्जनों के साथ नरक में ही जाना पसन्द करूंगा।” पूछा, “क्यों ?” तब जवाब मिला, जहाँ पर सज्जन है, वहीं पर स्वर्ग है और जहाँ पर दुर्जन हैं वहीं पर नरक है। दुर्जन पुरुष स्वर्ग को भी नरक बना छोड़ते हैं और सज्जन पुरुष नरक को भी स्वर्ग बना देते हैं। सत्पुरुष जहाँ जायेंगे वहीं पर स्वर्ग बन जाता है।
“सत्संगः परमं तीर्थं सत्संगः परमं पदम् ।
तस्मात्सर्वं परित्यज्य सत्संगं सततं कुर्व ॥”
सत्संग ही परम पवित्र तीर्थ है। सत्संग ही श्रेष्ठतम पद अर्थात् मोक्ष है। इस लिये सब छोड़ छोड़ कर काया वाचा मनसा नित्य सत्संग का ही सेवन करो। जब जब चित्त में नीच विषय विकार उत्पन्न हों, तब तब उस परिस्थिति का एक दम त्याग कर, सत्पुरुषों या सुमित्रों के पास तुरन्त जा बैठो। वहाँ जाते ही तुम्हारी सम्पूर्ण नीच वृत्तियाँ तत्काल दब जायंगी और मन व तन दोनों शान्त व पवित्र बन जायेंगे, यह स्वानुभव सिद्ध बात है। आप भी इसका अनुभव कर अपना उद्धार कीजिये।
एकान्तः—जिनके चित्त में कुविचार उत्पन्न होते हों, ऐसे दुर्बल चित्त वाले व्यक्तियों को एकान्तवास कदापि न करना चाहिये। उन्हें सदा इष्ट-मित्र, माता-पिता, भाई इनके समीप ही रहना चाहिये; इसी में कल्याण है।