ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
कर ताता, दुष्ट संग जनि देहि विधाता ।” अतः कल्याण चाहने वालों को कुसंग को एक दम प्रतिज्ञापूर्वक त्याग देना चाहिये और सत्सङ्ग को प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये । कुमित्रों से मिश्ररहित रहना ही लाख गुना श्रेष्ठ है; क्योंकि कुसंग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों मटियामेट हो जाते हैं और अन्त में महान् अधोगति होती है । परन्तु सत्संग से चारों पुरुषार्थ अनायास सध जाते हैं । याद रक्खो, राजपाट, गज, वाजि, धन, स्त्री, पुत्रादि सब कुछ मिलेंगे, परन्तु सत्सङ्ग मिलना परम दुर्लभ है । “विनु सत्सङ्ग विवेक न होई, राम कृपा विनु सुलभ न सोई ।”—यह गोस्वामी जी का वचन अक्षर अक्षर सत्य है । मोक्ष के सब साधन एक तरफ और सत्सङ्ग एक तरफ दोनों में सत्सङ्ग का ही दर्जा बहुत ऊँचा है ।
“तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला इक अंग । तुलै न ताही सकल मिलि, जो सुख लव सरसंग ॥
सच है, “शठ सुधरहिं सत्संगति पाई” कैसे ? तो जैसे “पारस परसि कुधातु सुहाई ।” यह नितान्त सत्य है कि “सम्पूर्ण दुराचार और व्यभिचार की जड़ एक मात्र कुसंगति ही है ।” अतः ब्रह्मचारियों को तथा अभ्युदयेच्छुओं को चाहिये कि कभी भी जीभ से बुरी बात न कहे, कान से बुरी बात न सुनें (जैसे कजली होली की गालियां व भद्रे भद्रे गीत आदि), आंख से बुरी चीज़ न देखें (जैसे नाटक, तमाशा, सिनेमा, नाचवाली रामलीला, भद्दी चीज़ इत्यादि), पैर से बुरी जगह न जायें, हाथ से बुरी चीज़ न छुवें और मन से विषय-चिन्तन हरगिज़ न करें । वस्त्रिकुम्भावों को