भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

कर ताता, दुष्ट संग जनि देहि विधाता ।” अतः कल्याण चाहने वालों को कुसंग को एक दम प्रतिज्ञापूर्वक त्याग देना चाहिये और सत्सङ्ग को प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये । कुमित्रों से मिश्ररहित रहना ही लाख गुना श्रेष्ठ है; क्योंकि कुसंग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों मटियामेट हो जाते हैं और अन्त में महान् अधोगति होती है । परन्तु सत्संग से चारों पुरुषार्थ अनायास सध जाते हैं । याद रक्खो, राजपाट, गज, वाजि, धन, स्त्री, पुत्रादि सब कुछ मिलेंगे, परन्तु सत्सङ्ग मिलना परम दुर्लभ है । “विनु सत्सङ्ग विवेक न होई, राम कृपा विनु सुलभ न सोई ।”—यह गोस्वामी जी का वचन अक्षर अक्षर सत्य है । मोक्ष के सब साधन एक तरफ और सत्सङ्ग एक तरफ दोनों में सत्सङ्ग का ही दर्जा बहुत ऊँचा है ।

“तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला इक अंग । तुलै न ताही सकल मिलि, जो सुख लव सरसंग ॥

सच है, “शठ सुधरहिं सत्संगति पाई” कैसे ? तो जैसे “पारस परसि कुधातु सुहाई ।” यह नितान्त सत्य है कि “सम्पूर्ण दुराचार और व्यभिचार की जड़ एक मात्र कुसंगति ही है ।” अतः ब्रह्मचारियों को तथा अभ्युदयेच्छुओं को चाहिये कि कभी भी जीभ से बुरी बात न कहे, कान से बुरी बात न सुनें (जैसे कजली होली की गालियां व भद्रे भद्रे गीत आदि), आंख से बुरी चीज़ न देखें (जैसे नाटक, तमाशा, सिनेमा, नाचवाली रामलीला, भद्दी चीज़ इत्यादि), पैर से बुरी जगह न जायें, हाथ से बुरी चीज़ न छुवें और मन से विषय-चिन्तन हरगिज़ न करें । वस्त्रिकुम्भावों को

❁ सत्संगति ❁

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नष्ट करने वाला परमात्मा का ही शुभचिन्तन व ध्यान हमेशा करें। वस, फिर तुम महात्मा ही हो और तुम्हें यहीं पर सच्चा स्वर्ग है।

एक समय भगवान् विष्णु ने राजा बलि से पूछा कि “तुम सज्जनों के साथ नरक में जाना पसन्द करोगे या दुर्जनों के साथ स्वर्ग में ?” बलि ने तत्काल उत्तर दिया कि “मैं सज्जनों के साथ नरक में ही जाना पसन्द करूंगा।” पूछा, “क्यों ?” तब जवाब मिला, जहाँ पर सज्जन है, वहीं पर स्वर्ग है और जहाँ पर दुर्जन हैं वहीं पर नरक है। दुर्जन पुरुष स्वर्ग को भी नरक बना छोड़ते हैं और सज्जन पुरुष नरक को भी स्वर्ग बना देते हैं। सत्पुरुष जहाँ जायेंगे वहीं पर स्वर्ग बन जाता है।

“सत्संगः परमं तीर्थं सत्संगः परमं पदम् ।

तस्मात्सर्वं परित्यज्य सत्संगं सततं कुर्व ॥”

सत्संग ही परम पवित्र तीर्थ है। सत्संग ही श्रेष्ठतम पद अर्थात् मोक्ष है। इस लिये सब छोड़ छोड़ कर काया वाचा मनसा नित्य सत्संग का ही सेवन करो। जब जब चित्त में नीच विषय विकार उत्पन्न हों, तब तब उस परिस्थिति का एक दम त्याग कर, सत्पुरुषों या सुमित्रों के पास तुरन्त जा बैठो। वहाँ जाते ही तुम्हारी सम्पूर्ण नीच वृत्तियाँ तत्काल दब जायंगी और मन व तन दोनों शान्त व पवित्र बन जायेंगे, यह स्वानुभव सिद्ध बात है। आप भी इसका अनुभव कर अपना उद्धार कीजिये।

एकान्तः—जिनके चित्त में कुविचार उत्पन्न होते हों, ऐसे दुर्बल चित्त वाले व्यक्तियों को एकान्तवास कदापि न करना चाहिये। उन्हें सदा इष्ट-मित्र, माता-पिता, भाई इनके समीप ही रहना चाहिये; इसी में कल्याण है।

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

“सद्ग्रन्थावलोकन”

नियम पाँचवाँ :—

वक्तव्यः—जहाँ सन्मित्र व सज्जन-संगति दुर्लभ हो वहाँ सद्ग्रन्थ-रूपी सज्जनों और मित्रों की संगति करन चाहिए। सद्ग्रन्थों द्वारा हम संसार के एक से एक महात्मा की संगति रात-दिन कर सकते हैं और उनसे जब चाहें तब तथा जितने मरतबे चाहें उतने मरतबे वार्तालाप कर सकते हैं और अपना ‘यथेष्ट’ समाधान कर सकते हैं। “सद्ग्रन्थ इस लोक के चिन्तामणि हैं। सद्ग्रन्थों के पठन-पाठन से सब कुचिन्तार्यें मिट जाती हैं, संशय-पिशाच भाग जाते हैं और मन में सद्भाव जागृत होकर परम शांति प्राप्त होती है। ज्ञानाग्नि से मनुष्य का सब पाप जल जाता है और मनुष्य पापात्मा से पुण्यात्मा और व्यभिचारी से ब्रह्मचारी बन जाता है। ज्ञानानन्द के सामने विषयानन्द फीका पड़ जाता है। बिना सिद्धान्त-वाक्यों के श्रवण किये किसी का आचरण कदापि शुद्ध नहीं हो सकता। श्रवण की महिमा अपरम्पार है। बिना देखे और सुने किसी का उद्धार आज तक न हुआ है, न होगा।

अतः हमें रोज़ प्रातःकाल और सायंकाल किसी पवित्र ग्रन्थ का पवित्रता और एकग्रतापूर्वक, शुद्ध जगह पर बैठ कर, थोड़ा ही नियमित पाठ करने का नियम बांध लेना चाहिये। पाठ को शान्ति और प्रसन्नता-पूर्वक पूरा किये बिना अत्र ग्रहण नहीं करेंगे—ऐसा एक निश्चय कर लेना चाहिये। इस प्रकार निश्चय कर लेने से मनुष्य के भीतर एक अद्भुत देवी शक्ति जागृत होती है, जो कि उसे उन्नति के शिखर पर पहुँचा देती है।

❁ सद्ग्रन्थावलोकन ❁

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गीता वा रोमयण का पाठ करना अत्यन्त उपकारी होगा। ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये योगवाशिष्ठ, वैराग्यमुमुक्षुप्रकरण, उपदेशरत्नाकर, ज्ञान वैराग्य प्रकाश, श्रीरामकृष्ण, शंकराचार्यकृत प्रश्नोत्तरमणिमाला, दासबोध,—ये पुस्तकें अति ही उपकारी हैं। इनका नित्य पाठ करना चाहिये। जैसे एक ही अन्न और जल रोज़ खाया और पिया जाता है, वैसे ही जो कुछ पढ़ा है उसे ही बराबर पढ़ना और उसका खूब मनन करना चाहिये, इसी में हमारा उद्धार है।

उपन्यासः—उपन्यासादि शृङ्गार रसपूर्ण ग्रन्थ पढ़ना मानों अपने हाथ अपने मकान में दियासलाई लगाना है। शृङ्गारी पुस्तकें बड़े ब्रह्मचारी को भी व्यभिचारी बना देती हैं, अच्छे अच्छे सच्चरित्र बालक बालकायें भी कुग्रन्थों के पठन और श्रवण से दुश्चरित्र बन गयी हैं। अतः कुग्रन्थों का सर्वदा त्याग करो, अच्छे ग्रन्थों का पता अपने सुमित्रों और भाइयों से पूछो। मूर्खता से कोई कुग्रन्थ न पढ़ बैठो। कुग्रन्थ पढ़ना और विष खा लेना दोनों समान है अतः जिन्हें नोच पुरुष न बनना हो, जिन्हें महापुरुष बनना हो, उन्हें चाहिये कि वे आग्रहपूर्वक महापुरुषों के चरित्र-ग्रन्थ पढ़ें।

चरित्र-ग्रन्थः—चरित्र ग्रन्थों के पढ़ने से बड़े बड़े पापात्मा भी पुण्यात्मा बन गये हैं। सुदों में भी जीवन फूँक देते हैं, महापुरुष के चरित्र-ग्रन्थ इस लोक के लिये चैतन्यामृत हैं। अतः जो अपना उद्धार चाहते हैं वे नित्य-प्रति धर्म-ग्रन्थ नीति-ग्रन्थ चरित्र-ग्रन्थ आदि पढ़ें पढ़ाये, सुने, सुनाये क्योंकि सद्ग्रन्थ ही धार्मिक-जीवन का भोजन है। सद्ग्रन्थ ही इस लोक के तारक मंत्र हैं। और कुग्रन्थ ही काल के सारक यंत्र हैं।

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

“घर्षण-स्नान”

नियम छटा:—

वक्तव्य:—ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये मन का और वाणी का पवित्र रहना अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि गन्दे शरीर से मन भी गन्दा बन जाता है। गन्दगी रोग का घर है। जो पुरुष रोगी है वह कभी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। पुनः रोगी शरीर से दीन और दुनियां दोनों डूब जाते हैं। अतः शरीर को सदा शुद्ध व बलिष्ठ बनाये रखना प्राणि मात्र का सब से प्रथम और मुख्य कर्तव्य है।

एक समय हमारी तरफ एक मनुष्य मोहरूम में शेर बनाया गया था। शरीर में वारनिश मिलाया हुआ पीला रंग सर्वत्र पोंत दिया गया था। दिन भर खेला-कूदा और रात को घर लौटा। थकावट के कारण जल्दी सो गया। सूर्योदय हुआ। ८-९ बजने पर भी नहीं उठा, तब लोग घबड़ा गये। पुकारने पर भी जब नहीं बोला तब लोगों ने किवाड़ तोड़ डाले और क्या देखते हैं कि वह मुर्दे की तरह अचल पड़ा है। तुरन्त डाक्टर को बुलाया। डाक्टर ने आते ही फौन उस शेर को टारपेन तेल, गरम पानी और साबुन से खूब रगड़ कर साफ किया। जब उस मनुष्य का शरीर स्वच्छ हुआ, चमड़े के सब छिद्र जब साफ खुल गये, तब कहीं १५ मिनट के बाद उसने गहरी सांस ली और आँखें खोलीं। अन्त में वह चंगा हो गया। इस दृष्टान्त से यह सिद्ध हुआ है कि नाक और मुँह से भी हमारे शरीर का चमड़ा कहीं अधिक साँस लेता है। चमड़े के छिद्र बन्द होने से नाक और मुँह खुले रहते

❁ धर्पणस्नान ❁

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हुएँ भी हम जी नहीं सकते । अतएव प्रत्येक स्त्री पुरुष को चाहिये कि वह शरीर की स्वच्छता में कभी आलस्य न करे, धर्पण-स्नान रोज किया करे । धर्पण-स्नान से त्वचा के सब छिद्र खुल जाने के कारण भीतर के असंख्य दूषित पदार्थ पसीने के रूप में बड़ी आसानी से बाहर निकल जाते हैं और बाहर की शुद्ध हवा भीतर जाने से शरीर निरोग बन जाता है । धर्पण-स्नान से मनुष्य अधिक तेजस्वी, निरोग, निर्विकारी, ब्रह्मचारी और दीर्घजीवी सहज में बन सकता है; और गन्दापन से वह रोगी, विकारी, आलसी, विपयी और अस्पायु बन जाता है । सब जगह पवित्रता ही जीवन है व अपवित्रता ही मृत्यु है । हम लोग अक्सर काक-स्नान ( कौआ-स्नान ) किया करते हैं । शिर पर १०—५ लोटे पानी डाल लिये और हो गया स्नान ! शरीर मलने से कुछ मतलब नहीं । लेखक ने तो एक मनुष्य को केवल एक ही लोटे पानी में स्नान करते हुए देखा है । यह बहुत ही बुरा है । नतीजा यह होता है कि, शरीर में का जहर बाहर नहीं निकलने पाता । पाखाना साफ नहीं होता है, जठराग्नि मन्द होने से खाना भी नहीं पचता, सदा अपच हुआ करता है । फिर भीतर के जहर को परम दयालु प्रकृति माता खुजली, दाद, फोड़ों के रूपों में शरीर के बाहर निकालने लगती है । रोग प्रकृति की स्पष्ट सूचनायें हैं और मनुष्य की दुर्गुप्तगी के अन्तिम इलाज हैं । इतने पर भी मनुष्य होश में न आये तो द्वार में इन्तजार करती हुई मृत्यु उसे चट से अपनी गोद में ले लेती है ।

धर्पण-स्नान की शास्त्रीय विधि:—स्नानके लिये प्रातःकाल सबसे अच्छा समय है । प्रातःस्नान से सब दिन बड़े आनन्द से बीतता

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

है और आलस्य नष्ट होकर सम्पूर्ण शरीर चैतन्यमय बन जाता है। अतएव स्नान सूर्योदय के पहले ही कर लेना चाहिये, जाड़े और वरसात में ८-१० या १५ मिनट और गर्मी में पूरा आधा घण्टा तक, जब तक कि मस्तिष्क पूरा ठण्डा न हो तब तक स्नान अवश्य करना चाहिये। स्वप्न-द्रोप से पीड़ित मनुष्य को तो शाम को भी दुबारा नहाना चाहिये। जहाँ तक हो, ताजा और स्वच्छ शीतल जल मस्तिष्क पर खूब डालना चाहिये। स्नान के लिये कूप का जल सब ऋतुओं में अनुकूल होता है; जाड़े में गर्म और गर्मी में सर्द होता है। स्नान से लिये कूप में से जल अपने ही हाथ खींचो उससे सीना और दण्ड पुष्ट हो जाते हैं। जाड़े में स्नान के पहले १०-१२ दण्ड और २५-३० बैठक लगा लेने से जाड़ा नहीं मालूम होगा। परन्तु वर्षण-स्नान में जोर से रगड़ने से जो कुछ व्यायाम होता है, उससे शरीर में काफ़ी गर्मी आ जाती है। स्नान के लिये पानी सदा ताजा, स्वच्छ व विपुल रहे, इस बात का स्मरण रहे। स्नान के पहले सब शरीर को सूखे तौलिया से व खुरखुरे बल्ब से (मुलायम से नहीं) खूब जोर से रगड़ो; रगड़ने में कुछ कमी न करो और कुछ डरो भी मत। पर हाँ उचित जगह पर उचित जोर लगाओ, नहीं तो मारे रगड़ो के आँख ही फोड़ लोगे। तौलिया से रगड़ने के बाद हाथ से रगड़ो। हाथ के रगड़ने से शरीर में एक विजली पैदा होती है। जो कि शरीर के तमाम रोगों को हटाती है। इस कारण शरीर का प्रत्येक अवयव अच्छी तरह से रगड़ना चाहिये। जहाँ संधर्षण न होगा उतनी ही जगह कमजोर और रोगी बनी रहेगी, यह बात ध्यान में रखो। पेट को ठीक रगड़ने से पेट के अनन्त विकार नष्ट होते हैं और पाखाना भी सांफ़ होता है।

❁ घर्षण-स्नान ❁

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स्नान के लिये बैठने पर गर्दन मुकाकर सब से पहिले एक-दो लोटे जल से शिर भिगोओ । यदि मस्तिष्क प्रथम न भिगोया जाय तो नीचे की तमाम गर्मी दिमाग में चढ़कर बड़ी ही हानि करेगी, स्मरणशक्ति नष्ट कर देगी, आँख की ज्योति विगाड़ देगी, मन में काम विकार प्रबल होंगे और स्वास्थ्य भी नष्ट हो जायगा । इस ही कारण “न च स्नायाद्विनाशिरः ।” सब से प्रथम बिना शिर को भिगोये व धोये स्नान कदापि न करना चाहिये, ऐसी सूत्रमय शाखाशा है । इस शास्त्र-हृत्स्य को न जानने से कारण ही, आज न मालूम कितने ही लोगों को मुफ्त में रोगी और अल्पायु बनना पड़ता होगा । अतएव सावधान रहो । गला, शिर भिगोने के बाद फिर गार के रक्खे हुये तौलिये से क्रमशः हाथ ! कंधे, सीना, पेट, पीठ, कमर, टाँग, पैर वगैरह खूब रगड़ो । फिर शिर पर से सम्पूर्ण शरीर भर में यथेष्ट पानी उड़ेलिये । हाथ से सब अंग फिर से रगड़ो । फिर शरीर भर में पानी उड़ेलो तत्पश्चात् सूखे तौलिया से सम्पूर्ण शरीर को पोंछ डालो । ( शरीर को साफ न पोंछने ही से गीलापन के कारण मनुष्य को अक्सर दाढ़, खुजली वगैरह हुआ करती है और खुजलाते खुजलाते अनेकों लड़कों को बुरी आदतें लग जाती हैं ) फिर धोती याँ ही लपेट कर खुली प्रकाशमय जगह में सूर्य-स्नान अर्थात् सूर्य के किरण शरीर पर लेते हुये थोड़ी देर इधर-उधर टहलो । शरीर पूरा सूख जाने के बाद फिर धोती पहन कर अपने धन्धे में लग जाओ । देखो, एक ही दिन के ‘घर्षण स्नान’ से आपके शरीर में क्या ही उत्साह, आनन्द, फुर्ती और कान्ति दिखाई देती है ! हमारा मुख अन्य भव अवयवों की अपेक्षा जो इतना सुन्दर और तेजस्वी दिखाई देता है, इसका मुख्य कारण

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

घर्षण-स्नान ही है। यदि एक ही दिन में घर्षण-स्नान से मनुष्य में इतना आनन्द, उत्साह आरोग्य, शान्ति व कान्ति दिखाई देती है, तो नित्यप्रति इस प्रकार विधिपूर्वक घर्षण-स्नान करने से मनुष्य का आनन्द, उत्साह, आरोग्य शान्ति व कान्ति और भी अधिक बढ़ेगी इसमें सन्देह ही क्या है ?

स्नान के कुछ शास्त्रीय नियम—( १ ) रोज दो मरतवे स्नान करना अच्छा है। गर्मी के दिनों में तो हमको दो मरतवे स्नान करना ही चाहिये। क्योंकि दिन भर के पसीने के कारण शरीर से बड़ी ही वद्वू निकलने लगती है। पसीने में बहुत ज़हर होता है, यह बात ध्यान में रखो। ( २ ) महीने में एक मरतवे गर्म पानी और साबुन या सोड़ा से नहाना बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद होता है, त्वचायें और भी साफ हो जाती हैं। परन्तु रोज गर्म पानी से नहाना अच्छा नहीं है। यह अप्राकृतिक है। उससे मनुष्य कमज़ोर नाजुक, चंचल व विषयी बन जाता है। नित्य गर्म पानी से नहाना ब्रह्मचर्य के लिये बहुत ही हानिकर है। ( ३ ) नदी और तालाब का स्नान और भी अच्छा होता है। शास्त्र में समुद्र-स्नान की महिमा सब से अधिक है क्योंकि समुद्र जल में एक प्रकार की विजली होने के कारण मनुष्य अधिक निरोग और चैतन्यमय बन जाता है। यदि घर के पानी में भी समुद्र का नमक मिलाकर स्नान किया जाय तो उससे भी विशेष फायदा होता है। बाद में शुद्ध जल से स्नान कर लेना चाहिये। ( ४ ) तैरने में बहुत से लाभ हैं। तैरने में सभी अवयवों को व्यायाम होता है, सीना पुष्ट और विस्तीर्ण होता है, फेफड़े शुद्ध और वलवान होते हैं और सम्पूर्ण शरीर निरोग, फुर्तीला, सुदृढ़, दमदार, उत्साही और शक्तिशाली बनता है। परन्तु

❁ धर्पण-स्नान ❁

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तैरना नियमपूर्वक होना चाहिये; तैरना अपने और दूसरों की प्राण रक्षा के लिये एक बहुत ही अच्छी कला है। क्या डूबते समय हमारी किताबें काम देंगी ? कदापि नहीं। अतः इस हुनर को स्वास्थ्य की दृष्टि से हर किसी को अवश्य सीख लेना चाहिये (५) स्नान भोजन के पहले वा बाद में तीन घंटे के अन्तर पर करना चाहिये। नहाने के बाद तुरन्त भोजन करने से अथवा भोजन के बाद तुरन्त नहाने से पित्त बढ़ जाने के कारण पाचन-क्रिया विगड़ जाती है जिससे कि रोग व मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं। अतः एव सावधान रहो। (६) रोगा, दुर्बल, वा नाजुक मनुष्य को हफ्ते में ताजा ठण्डे पानी से जरूर नहाना चाहिये और बहुत धीरे धीरे ठण्डे जल से नहाने का अभ्यास डालना चाहिये। (७) तौलिया से रगड़ने और थोड़ी सी कसरत करने पर भी यदि बहुत ही जाड़ा मालूम होता हो, हमें स्नान हरगिज न करना चाहिये (८) स्नान के लिये जगह एकान्तपूर्ण, खुली हवादार, प्रकाशमय होनी चाहिये, स्नान के समय शरीर पर जितने ही कम कपड़े होंगे उतना ही अच्छा है, क्योंकि खुले शरीर पर सदी गर्मी असर नहीं कर सकती। लंगोट पहिन कर नहाना बहुत अच्छा है; घर पर एकान्त में विवस्त्र नहाना सबसे अच्छा है, जलाशय में नहीं। यद्यपि नंगा नहाना पश्चात्यों ने पसन्द किया है तथापि वह भारतीय सभ्यता के सर्वथा विरुद्ध है, भारतीयों के लिये लंगोट सहित नहाना ही सर्व श्रेष्ठ है। (९) वीर्यपात होने के बाद तुरन्त नहा लेना चाहिये।

जापानी लोग धर्पण-स्नान का महत्त्व भोजन से भी अधिक मानते हैं और इसी कारण आज वे इतने उत्साही, उद्योगी, दीर्घायु

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

और सब बातों में तेजस्वी दिखाई देते हैं ! परन्तु हम लोग, उन्हीं के भाई, मुर्दों के समान निर्बिध गोबरगणेश दिखाई दे रहे हैं । यह कितने शोक और लज्जा की बात है ? अब हमें अवश्य ही जागना चाहिये और हमेशा उन्नतिमद काम करने चाहिये । सब उन्नति का मूल शरीर है । अतः उसे पहले सुधारना चाहिये । योही हाथ बुमाने से जैसे फोड़े वर्तन ( पात्र ) साफ नहीं हो सकता, उसे जोर से ही रगड़ना पड़ता है, तद्वत् शरीर रूपी वर्तन भी, वगैर धर्पण-स्नान के बाहर भीतर से साफ और चमकीला नहीं हो सकता । काफ-स्नान से मनुष्य सदा रोगी, मलीन, आलसी, विपथी, निस्तेज और अल्पशु होता है । परन्तु वही मनुष्य यदि धर्पण-स्नान आज ही से शुरू कर दे, तो थोड़े ही दिनों में पूर्ण निरोगी, निर्निर्काशी, उत्साही व तेजस्वी बन सकता है । ब्रह्मचर्य तथा दीर्घ जीवन के लिये धर्पण-स्नान अत्यन्त आवश्यक और अमृत तुल्य है ।

“सादा व ताजा अल्पाहार”

नियम सातवां :—

वक्तव्यः—ब्रह्मचर्य और भोजन में अत्यन्त घनिष्ठ संबंध है । भोजन के महत्व को बहुत लोग नहीं जानते, इस कारण उन्हें अत्यन्त दुःख उठाना पड़ता है । जिसे ब्रह्मचारी बनना है, उसको सादा और अल्पाहारी अवश्य ही बनना होगा । अधिक भोजन करने वाला सात जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता । क્યાंकि जोर की आँधी जैसे पेड़ों को उखाड़ डालती है, वैसे ही कामदेव

❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁

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पैट्ट मनुष्य को पटक पटक कर मार डलता है। अधिक भोजन करने वाला पुरुष किसी हालत में वीर्य को नहीं रोक सकता। उसका चित्त सदा विषय की ओर लगा रहता है। मन और तन दोनों रोगी बन जाते हैं, आयु घट जाती है और स्वार्थ व परमार्थ दोनों मटियामेट हो जाते हैं। स्वप्नदोष अक्सर अधिक भोजन ही से हुआ करता है। यदि आप को वीर्यवान व आरोग्यवान् बनना हो, स्वप्नदोष से और अकालमृत्यु से बचना हो तो आपको अवश्य ही सदा और अल्पाहारी बनना होगा।

एक समय ईरान के बादशाह वहमन ने एक श्रेष्ठ वैद्य से पूछा “दिन-रात में मनुष्य को कितना खाना चाहिये ?” उत्तर मिला “सौ दिरम अर्थात् ३९ तोला ।” फिर पूछा, “इतने से क्या होगा ?” हकीम बोला, “शरीर-पोषण के लिये इस से अधिक नहीं चाहिए। इसके उपरान्त जो कुछ खाया जाता है वह सिर्फ वीभ ठोना और उम्र को खोना है।

यह सिद्धान्त है कि आहार, निद्रा, भय, मैथुन, क्रोध, कलह आदि बातें जितनी बढ़ाई जायँ उतनी ही बढ़ती जाती हैं और जितनी कम की जायँ उतनी कम होती जाती हैं। भगवान् बुद्ध कहते हैं:—“एक बार हलका आहार करने वाला “महात्मा” है; दो बार सम्हल करके खाने वाला बुद्धिमान् व भाग्यवान् है; और इससे अधिक वे अटकल खानेवाला महामूर्ख, अभागा और पशु का भी पशु है ।” सच है, गले तक खूब दूस दूस करके खाना और फिर पछताना कौन बुद्धिमान् है ? ये क्या भाग्यवान् के लक्षण हैं ? भोजन सुख के लिए खाया जाता है या दुःख के लिए ? जिस भोजन से दुःख उपजता है उस भोजन को विष तुल्य ही समझना

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❁ महत्त्वपूर्ण ही जीवन है ❁

चाहिये । “भोजन तारता भी है और मारता भी है ।” अधिक भोजन से मनुष्य जीते जी ही सुर्दी और बेकार बन जाता है । भक्तदास वामन कहते हैं:—

“ज्यादा घायु भरनसे, फूटवाल फट जाय ।

घड़ी कृपा भगवान् की, पेट नहीं फट जाय ॥१॥

“यदपि न दीखत पेट फटा, फटत मनुज का देह ।

रोग भयंकर होता है, धने नरक का गेह” ॥२॥

अतः तन्दुरुस्ती के लिये खाओ; रोगी बनने के लिए मत खाओ । जो कुछ खाओ जीने के लिए खाओ, मरने के लिये मत खाओ । बहुत भोजन करने वाला बहुत जल्द मरता है । अमेरिका के सुप्रसिद्ध डाक्टर म्याक्क्याडन कहते हैं:—“आजकल साधारणतः लोग भोजन के वहाने जितने पदार्थों का सत्यानाश करते हैं उनके चतुर्थीश से ही उनका काम बड़े आनन्द से चल सकता है । अकाल में अन्न के अभाव से लोग उतने नहीं मरते, जितने कि सुकाल में अधिक अन्न खाने से तरह तरह के रोगों से मर जाते हैं ।” देश में दुष्काल भी पेटू लोगों की ही कृपा से पड़ता है । अतः पेटू मनुष्यों को स्वयं अपना तथा देश का भी वैरी समझना चाहिये ।

अरेरे ! गरीब लोग बेचारे भोजन न मिलने से मरते हैं और धनी तथा पेटू लोग अधिक खाने से मरते हैं, केवल मध्यम प्रकार के मिताहारी पुरुष ही ब्रह्मचारी और दीर्घजीवी हो सकते हैं । देश में प्लेग, कालरा भी पेटू लोगों के ही कारण होते हैं, क्योंकि पेटू मनुष्य बहुत गन्दे होते हैं । कमाना, खाना और पाखाना ये ही उनके इस संसार में के तीन मुख्य काम होते हैं और अन्त में वे

❁ सादा व ताप्ता अल्पाहार ❁

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खाते खाते ही मर जाते हैं। पेट्ट मनुष्य सदा दुःखी, आलसी, रोगी और अल्पायु बना रहता है। देश में जब कोई रोग फैलता है, तब पेट्ट मनुष्य सब से पहले काल का शिकार बन जाता है और इस बात का अनुभव हैजा के दिनों में प्रत्यक्ष होता है। हैजा की बीमारी सब से पहले अधिक भोजन करने वालों ही को होती; है केवल अल्पाहारी पुरुष ही बच सकते हैं। अतः सज्जनों ! अधिक भोजन करना—परोपकार के लिये नहीं तो स्वार्थ के लिये अर्थात् अपने उद्धार के लिये—अवश्य छोड़ दो। सिर्फ जितना पचा सकते हो उतना ही खाओ, इससे एक भी फ़बर ज्यादा खाना मानो अपनी आयु का एक एक दिन कम करना और अकाल में काल के मुँह में जाना है। श्री मनु महाराज कहते हैं:—

अनारोग्यं अनायुष्यं अस्वर्ग्यं घाडतिभोजनं ।

अपुण्यं लोकविद्विषं तस्मात्तपरिवर्जयेत् ॥

“अति भोजन रोगों को बढ़ाने वाला, आयु को घटानेवाला, नरक में पहुँचाने वाला, पाप को कराने वाला और लोगों में निन्दित करने वाला है ( यानी फलों मनुष्य बड़ा पेट्ट है इस प्रकार की बढ़नाभी करने वाला है ) अतः बुद्धिमान् को चाहिये कि किसी बढ़िया पदार्थ के फेर में पड़ कर, जरूरत से अधिक कदापि न खाये ! क्योंकि वैसा करना पूर्ण अघर्म है। पेट्ट मनुष्य आत्म हत्यारा कहा जाता है। पेट्ट मनुष्य की धर्म-बुद्धि विलकुल नष्ट हो जाती है और वह हठात् पापकर्मों में प्रवृत्त होता है। संपूर्ण पाप की जड़ अधिक भोजन करना ही है। अधिक भोजन ही से काम, क्रोध रोगादि अधिक प्रबल बन जाते हैं और

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❁ अन्नचर्य ही जीवन है ❁

कम भोजन से वे कमजोर बन जाते हैं। इसी गंभीर सिद्धान्त को जानकर महर्षियों ने शाखों में उपवास का महत्व वर्णन किया है।

भक्तदास वामन ग्रन्थोत्तर में कहते हैं:—“निकम्मा कौन है ? पेट्। महापुरुष की क्या पहिचान है ? जो अपने को सब से छोटा समझता हो। महापुरुष कैसे बनें ? मन को वश में करने से। मन कैसे वश होय ? कम खाने से। कम खाना कैसे सीखे ? आहार को थोड़ा थोड़ा घटाने से। आहार कैसे घटे ? रोज सादा और प्राकृतिक भोजन करने से। सादा भोजन कैसे प्रिय लगे ? भूख के समय खाने से और प्रत्येक ग्रास ( कवर ) को खूब अच्छी तरह चवाने से। भूख का समय कैसे जाने ? नियम बांध लेने से और फिर बीच में कुछ भी न खाने से।”

संचमुच प्रकृति क अनुसार चलने ही से हम पेट्टपन से और तज्जन्य अनन्त विकारों से वच सकते हैं। भोजन में सौ प्रकार रहने से मनुष्य अक्सर ज्यादा खा लेता है और फिर सौ प्रकार से सौ विकार अवश्य ही उत्पन्न होते हैं।

आस्ट्रेलिया के प्रसिद्ध डाक्टर हर्न कहते हैं:—“मनुष्य जितना खा लेता है उसका तिहाई हिस्सा भी नहीं पचा सकता। बाकी पेट में रह कर रक्त को विपैला बनाकर असंख्य विकार पैदा करता है; जिससे कि प्राणशक्ति का दोहरा नाश होता है, एक तो इस फाल्गु भोजन को पचाने में और दूसरे उसको बाहर निकालने में।

यदि मनुष्य भोजन कम प्रकार के खाय, नमक-मिर्च मसाला से रहित सात्विक भोजन करे, प्रत्येक ग्रास को खूब महीन पीस कर चबा चबाकर खाय, शान्ति रखे और जितना पचा:

❁ सादा व तात्ता अल्पहार ❁

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सके उतना ही खाय तो वह ब्रह्मचर्य को बड़ी आसानो से धारण कर सकता है और १०० वर्ष तक जीवित रह सकता है। इसी के बल पर सुप्रसिद्ध अमेरिकन यंत्रकार एडिसन कहते हैं “मैं सौ वर्ष पर्यन्त अवश्य जीवित रहूँगा।,,

“If you can conquer your tongue only, you are sure to conquer your whole body and mind at ease.” यदि तुम सिर्फ जिह्वा को वश में करो तो तुम्हारे मन व शरीर अनायास वश में हो जायेंगे इसमें कोई सन्देह नहीं है। जिह्वा को संस्कृत में रसना कहते हैं। क्योंकि वह शृंगार, चीर, शान्त आदि सभी नवरस की उत्पन्न करने वाली है। सात्विक भोजन से शान्तरस उत्पन्न होता है, राजसी भोजन से शृंगार रस और तामसी भोजन से वीभत्स रौद्रादि रस उत्पन्न होते हैं। जो रस अधिक बलवान होता है सम्पूर्ण रस उसी के अधीन हो जाते हैं। इसी लिए कहा है:—

आहारशुद्धोऽसत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धो भ्रुवास्मृतिः।

स्मृतिलब्धे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ज्ञान्दोग्य ॥

“अर्थात् आहार की शुद्धि से सत्त्व की शुद्धि होती है, सत्त्व शुद्धि से बुद्धि निर्मल और निश्चयी बन जाती है, फिर पवित्र व निश्चयी बुद्धि से मुक्ति भी सुलभता से प्राप्त होती।” अतः जिन्हें काम क्रोधादिक से मुक्त होना है—उन पर विजय प्राप्त करना है—उन्हें चाहिए कि वे नित्य नियमित समय पर सात्विक अल्पाहार किया करें; क्योंकि कहा है ‘As a man eateth so he becometh’ जैसा मनुष्य भोजन करता है वैसा ही वह बन जाता है। यदि मनुष्य दो साल पर्यन्त लगातार सादा अर्थात्

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❁ आत्मचर्य ही जीवन है ❁

सात्विक अलपाहार किया करेगा तो उसकी कुसुद्धि आप से आप नष्ट हो जायगी और उसमें ईश्वरीय तेज प्रगट होने लगेगा। कुछ ही दिन तक अभ्यास करके देख लीजिये।

सात्विक आहार:—जो ताज़ा, रसयुक्त, हलका, स्नेहयुक्त, स्थिर (nutritious) मधुर, प्रिय हो। जैसे गेहूँ, चावल, जौ, साठी, मूंग, अरहर, चना, दूध, घी, चीनी, सेंधा नमक, रतालू (अकरकन्द) शुद्ध व पके फल, इनको सात्विक आहार कहते हैं।

राजसी आहार:—अत्यन्त उष्ण, कडुवा, तीता, नमकीन, अत्यन्त मीठा, सूखा, चरपरा, खट्टा, तैलयुक्त, द्रोपयुक्त, गरिष्ठ, जैसे पूड़ी, कचौरी, मालभूआ, भिठाई, खटा, लालमिर्च तेल, हींग, प्याज, लहसुन, गाजर उरद, मसूर, सरसों, मसाला, मांस, मछली, कलुआ, अंडा, शराब, चाय, काफी, डांफी, कोको, सोडा, लेमन, पान, तन्त्राकू, गाँजा, भाँग, अफीम, कोकेन, चरस, चखौल इनको राजसी आहार कहते हैं।

राजसी आहार से मन चंचल, कामी, क्रोधी, लालची और पापी बन जाता है; रोग, शोक, दुख, दैन्य बढ़ते हैं और, आयु, तेज, सामर्थ्य और सौभाग्य वेग के साथ घट जाते हैं। राजसी पुरुष कदापि ब्रह्मचारी नहीं हो सकता।

तामसी आहार:—तामसी आहार में राजसी आहार तो आता ही है; परन्तु उसके अलावा जो वासी रसहीन, गला हुआ, दुर्गन्धित, विषम (जैसे एक ही साथ तेल के व घी के पदार्थ खाना वगैरह) घृणित व निन्द्य होता है, इसको “तामसी आहार” कहते हैं।

तामसी आहार से मनुष्य अत्यन्त राक्षस बन जाता है। ऐसा

❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁

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पुरुष सदा रोगी, दुःखी, बुद्धिहीन, क्रोधी, लालची, आलसी, दुरिद्री अधर्मी, पापी और अल्पायु बन अन्त में नरकगामी होता है। ( गीता अ० १७ देखो )।

अतः जिन्हें ब्रह्मचर्य का पालन कर अपना उद्धार करता है, उन्हें चाहिये कि राजसी व तामसी आहार को छोड़कर दैवी तेज बढ़ाने वाला सात्विक अल्पाहार आज ही से शुरू कर दें। परन्तु यह ध्यान में रहे कि सात्विक भोजन भी वासी हो जाने पर तामसी बन जाता है और अधिक खा लेने से राजसी इतना ही नहीं बल्कि प्राण हरण करने जैसा महान तामसी भी बन जाता है, अतः अल्पाहार ही सात्विक आहार कहा जा सकता है।

“भोजन अच्छी तरह से कुचल कुचल कर खाना” यह प्रकृति का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है। इससे मामूली भोजन भी अत्यन्त मिष्ठ व पुष्ट मालूम होता है। पश्चात् भी है मजे में पाखाना भी साफ होता है; भोजन भी कम लगता है और इस प्रकार दैहिक, आर्थिक तथा देश की दृष्टि से भी अधिक लाभ होता है। परन्तु जल्दी जल्दी खाने से मनुष्य सदा दुःखी, मलीन, कामी, पेट्ट, अतुस, रोगी; उदासीन, क्रोधी चिड़चिड़ा और अल्पायु बना रहता है। वह जमी और कञ्जियत भी इसी से हुआ करती है। जल्दी दांत दूटने का भी यही कारण है। पशुओं के दांत अन्त तक नहीं दूटते, इसका मुख्य कारण “चर्वित चर्वण” ही है। अतः दाँत से योग्य काम लो; क्योंकि पेट को दाँत नहीं होते। दाँत कुछ दिखलाने के लिये नहीं दिये गये हैं। यदि मनुष्य प्रत्येक मास ३०-४० बार अथवा प्रकृति के हिसाब से वत्तीस दाँत के लिये वत्तीस बार खूब चवा चवा के खावेगा तो आज वह जितना भोजन करता है उसके ६ (तिहाई)

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

भोजन ही में उसकी पूरी वृत्ति हो जायगी और प्राण-शक्ति का भी बहुत कम नाश होगा; भोजन भी बहुत जल्द पचेगा; पाखाना भी साफ होगा और इन्द्रिय-दमन की भी शक्ति उसे बहुत जल्द प्राप्त होगी। लेखक का यह स्वयं अनुभव है। इसे कोई भी आजमा सकता है।

भोजन बिना अच्छी तरह चवाये जो जल्दी खा लेते हैं, वे जल्दी ही मर जाते हैं। चर्बित चर्वण से भोजन के प्रत्येक परमाणु से मनुष्य-प्राणतत्व को (जो कि प्राणिमात्र के जीवन का मुख्य आधार है उसको) ब्रह्म की भावना से विशेष र्खांच सकता है। अतः “अन्नं ब्रह्मेत्युपासीत।” अन्न में ब्रह्म-दृष्टि रखो और “अन्नं दृष्ट्वा प्रणम्यादौ।” अन्न को प्रथमतः प्रणाम करके फिर भोजन किया करो। योगी लोग ऐसे ही करते हैं और इसी कारण वे थोड़े ही भोजन में रुम हो जाते हैं और उनमें ब्रह्म-भावना के कारण दैवी सामर्थ्य प्रगट होता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है। अमीरी भोजन करना मानों साक्षात् सौप पर पैर रखना है। ऐसे लोगों में काम क्रोध का विष बहुत ज्यादा फैला हुआ रहता है। इस बात का पता धनी लोगों पर दृष्टि डालने से तत्काल लग जाता है। धनी लोगों का यह एक विचित्र खयाल है कि “जो कुछ वीर्य नष्ट किया जाता है वह हलुआ, पूड़ी, रवड़ी उड़ाने से फिर वापिस मिलता है।” परन्तु यह उनकी बड़ी भारी मूर्खता है। जो भोजन बड़े बड़े पहलवानों से भी बिना खूब फसरत किये, नहीं पच सकता; वह गरिष्ठ भोजन, दिन-रात निठल्ले बैठे हुए और अधिक भोजन से और भोग-विलास के कारण जिनकी अति वेकाम हो गई हैं, उनको कैसे पच सकता है? “धातुक्षयात् स्वते रक्ते मन्दः संजायतेऽनलः।”

❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁

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यानी धातु के नाश से रक्त कमजोर हो जाता है और रक्त कमजोर हो जाने से अग्नि यानी भूख भी मन्द पड़ जाती है। यह आयुर्वेद का सिद्धान्त है; अर्थात् पुष्ट और उत्तेजित भोजन से ऐसे लोगों का रहा-सहा वीर्य और भी उल्लूट पड़ता है और वे अधिकाधिक बरबाद होते जाते हैं। तिस पर भी वे सूखी हड़डी चवाने वाले और अपने ही मुख से निकले हुए रक्त को उख सूखी हड़डी ही से निकला हुआ समझने वाले मूर्ख कुत्ते की तरह, अपने पहले ही वीर्य को मालपुआ के प्राप्त हुआ समझते हैं। वाह ! खूब अकलमन्दी ! भक्दास वामन कहते हैं:—

“पालो पत्नी खॉय जो उन्हें सतावे काम। नित प्रति हलुवा निगलते उनकी जाने राम ॥

—भक्दास वामन।

अतः जिन्हें वीर्य की रक्षा करनी है उन्हें चाहिए कि वे मिठाई, खटाई, नमक, मिर्च, मसाला से सर्वथा बचे रहें। सदा सस्ता, सादा, स्वच्छ और स्वरूप भोजन किया करें। नमक, मिर्च, मसाला ये बड़े कामोत्तेजक पदार्थ हैं। लाल मिर्च तो ब्रह्मचर्य के लिये प्रत्यक्ष काल ही है। अतः उन्हें धीरे धीरे कम करके सर्वथा शीघ्र त्याग दें। अभ्यास से कोई भी बात असंभव नहीं है। निश्चय होने पर सभी बातें सहल हैं।

योगी लोग नमक, मिर्च मसालादि नहीं खाते; अनभ्यास के कारण उन्हें वे अच्छे ही नहीं लगते। यदि तुम्हें योगी अर्थात् सुखी बनना हो, वियोगी अर्थात् दुःखी न बनना हो, तो तुमको भी उन्हीं की तरह सात्विक अल्पाहार खूब कुचल कुचल के करना होगा।