भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

❁ सत्संगति ❁

[ ८५ ]

बड़े बड़े शीलवान, गुणवान, और होनहार बालक-बालिकायें तथा स्त्री-पुरुष धूल में मिल गये हैं । कुसंग का प्लेग महान् भयानक होता है । जंगली जानवर का वा काले साँप का भी साथ बहुत अच्छा है; उससे मनुष्य की केवल मृत्यु ही होगी । परन्तु दुर्जन का संग महान् दुर्गतिकर है; वह मनुष्य को नीच योनियों में व नरक में ही डालने वाला है । पण्डित विष्णु-शर्मा कहते हैं:—

“वरं प्राणत्यागो न पुनरधमानासुपगमः ।”

“प्राण त्याग देना अच्छा है परन्तु नीचों के पास जाना तक घुरा है ।” “जैसा संग वैसा रंग” यही प्रकृति का कायदा है । धुवों के संग से सफेद मकान भी काला पड़ जाता है । लता में का कीड़ा लता ही के तुल्य हरा बन जाता है । वैसे ही दुर्जन के साथ मनुष्य भी दुर्जन बन जाता है और सज्जन के साथ सज्जन । “कामी के संग काम जागे पै जागे” “कायर के संग शूर भागै पै भागै” “काजर की कोठरी में कैसोहू सवानो घुसो, एक रेख काजर की लागै पै लागै ।” कवि का यह कथन अक्षरशः सत्य है । नीच पुरुष अपने ही तुल्य अपने मित्रों को भी नीच, पापी और दुर्गत्मा बना डालते हैं और सत्पुरुष अपने ही जैसे अपने मित्रों को भी पुर्यात्मा महात्मा बना देते हैं ।

सत्संग की महिमा अपरंपार है । सत्संग से मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति होती है और कुसंग से नरक की प्राप्ति होती है । सत्संग की महिमा और कुसंग की अधमता किसी से छिपी नहीं है । कुसंग से मनुष्य जीते जी ही नरक का सा अनुभव करने लग जाता है । इसी कारण से गोस्वामी जी कहते हैं—“वरु भल वास नरक

ब्रह्मचर्य ही जीवन है · पृष्ठ 101, कुल 199 में से · BharatKosha