भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

जीवन है और सजावट ही नाश है, यह तत्त्व पूर्णरीति से ध्यान में रखो ।

“सत्संगति”

नियम चौथा :—

सत्संगत्वे निःसंगत्वं निःसङ्गत्वे निर्मोहत्वम् । निर्मोहत्वे निश्चलत्वं निश्चलत्वे जीवन्मुक्तः ॥

—श्रीमच्छङ्कराचार्य ।

“सत्सङ्ग से निःसङ्ग ( Non-attachment ) की प्राप्ति होती है; निःसङ्ग से निर्मोहत्व अर्थात् विषय से अप्रतीति बढ़ती है; निर्मोह से सत्य का पूरा ज्ञान व निश्चय होता है और सत्त्व के निश्चल ज्ञान से मनुष्य जीवन्मुक्त होता है अर्थात् इस संसार से तर जाता है ।”

वक्तव्यः—संसार में ‘आत्मोन्नति’ के लिये जितने साधन मौजूद हैं उन सब में सत्संग सब से श्रेष्ठ उपाय है । ‘सत्संग’ यह शब्द अत्यन्त महत्व का है । सत्संग में संसार की तमाम उत्ततिकर बातों का समावेश होता है । जैसे पवित्र व ऊँचे विचार करना, पवित्र व मीठे वचन बोलना, पवित्र वचन सुनना, पवित्र भोजन करना, पवित्र स्वदेशी कपड़े पहनना आदि अनन्त बातों का समावेश होता है और ‘कुसंग’ में संसार की तमाम स्वपरनाशकारी बातों का समावेश होता है । सत्संग से मनुष्य देवता बनता है और कुसंग से मनुष्य राक्षस बन जाता है । भक्त तुलसीदास जी पूछते हैं “को न कुसंगति पाय नसाई ?” सच है, कुसंग से आज तक