ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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भीतरसों मैलो हियो, बाहर रूप अनेक । नारायण तासों भले, कौआ तन मन एक ॥
खुद “न-खरा” शब्द ही मनुष्य की खोटी चाल को सावित कर रहा है । विशेष सज-धज करना, ऊँचे ऊँचे और रंगे-विरंगे भड़कीले व कामोत्तेजक कपड़े पहिनना, अपने हाथ अपने गले में मालाये पहरना, अंग में और बालों में सुगन्धित तैल, इत्र आदि लगाना, नेकट्राई, कॉलर, रिस्टवाँच से अपने को सवॉरना, बार बार शीशे में सूरत देखना, पान से मुँह लाल करना,—ये सब ब्रह्मचर्य के लिये काल के समान हैं । परन्तु शोक की बात है कि कई सयाने माता-पिता खुद अपने ही हाथ से, अपने बच्चों को इन विषय-अवृत्तिकर बातों में फँसा रहे और इस प्रकार अपने बच्चों को विगाड़ रहे हैं । भला ऐसे लोग विषय को कैसे जीत सकते हैं ? “कहत कवीर सुनो भाई साधो, ये क्या लड़ेगे रण में ?” यदि हमारे ईर्द-गिर्द शृङ्गारपूर्ण सामग्री न हो तो आत्मसंयम के कामों में बहुत ही सहायता मिल सकती है और हम बड़ी आसानी से आत्मसंयम कर सकते हैं । पास में खाने के लिये होने पर जैसे बराबर फूठी ही भूक लगती है, वैसे ही विलासी वस्तुओं और व्यक्तियों से घिरे रहने पर मन में काम भी बराबर जाग उठता है । ऐसा करना असंशयतः अपने भले मन को और भी विगाड़ना है; आग में तेल डालना है; वास्तव में यह भी एक प्रकार का छिपा कुसंग है । अतः इन सब भोग-विलास की बातों से सदैव दूर रहो । सादी रहन-सहन अथवा भोग-विलास से विरक्ति ही ब्रह्मचर्य-रक्षा का सहज उपाय है । सादगी ही