ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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ॐ तत्सत्
ब्रह्मचर्य ही जीवन है
१—ब्रह्मचर्य की महिमा
न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोऽमम् । ऊर्ध्वरेता भवेद् यस्तु स देवो न तु मानुषः ॥ १ ॥
भगवान् कैलाशपति शङ्कर कहते हैं:—“ब्रह्मचर्य अर्थात् वीर्य धारण यही उत्कृष्ट तप है। इससे बढ़ कर तपश्चर्या तीनों लोकों में दूसरी कोई भी नहीं हो सकती। ऊर्ध्वरेता पुरुष अर्थात् अखण्डवीर्य का धारण करनेवाला पुरुष इस लोक में मनुष्य रूप में प्रत्यक्ष देवता ही है।”
अहा हा ! क्या ही महान् इस ब्रह्मचर्य की महिमा है ! परन्तु आज हम इस महानता को मूलकर नीचता की धूल में दास्यभाव से विचरण कर रहे हैं। कहाँ हमारे वीर्यवान्, सामर्थ्य-संपन्न पूर्वज और कहाँ हम उनकी निर्वीर्य और पद-दलित दुर्बल सन्तान ! ओफ़ ! कितना यह आकाश पाताल का अन्तर हो गया है ? हमारा कितना भयंकर पतन हुआ है ? इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि हमारा यह जो भीषण पतन हुआ है इसका मुख्य कारण एक मात्र