ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
हमारे “ब्रह्मचर्य का हास” ही है। ब्रह्मचर्य के नाश से ही हमारा संपूर्ण सत्यानाश हो गया है। हमारा सुख, आरोग्य, तेज, विद्या, बल, सामर्थ्य, स्वातन्त्र्य और धर्म संपूर्ण हमारे ब्रह्मचर्य के ऊपर ही सर्वथा निर्भर है। ब्रह्मचर्य ही हमारे आरोग्य-मन्दिर का एक मात्र आधारस्तंभ है। आधारस्तंभ के टूटने से जैसे सम्पूर्ण भवन ढह जाता है, वैसे ही वीर्यनाश होने से संपूर्ण शरीर का भी नाश अति शीघ्र हो जाता है। जैसे जैसे हमारे ब्रह्मचर्य का नाश होता है, वैसे वैसे हमारा स्वास्थ्य का भी नाश होता जाता है। “मरणं विन्दुपातेन जीवनं विन्दुधारणात्।” यह भगवान् शंकर का अमिट सिद्धान्त है। वीर्य को नष्ट करने वाला पुरुष कभी बच नहीं सकता और वीर्य को धारण करनेवाला कभी अकाल में मर नहीं सकता। तत्वतः व वस्तुतः ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है। ब्रह्मचर्य के अभाव से हम किसी अवस्था में सुखी और उन्नत नहीं हो सकते। ब्रह्मचर्य ही हमारे इह लोक व परलोक के सुख का एक मात्र आधार है। यही नहीं किन्तु ब्रह्मचर्य ही हमारे चारों पुरुषार्थों का मुख्य मूल है—मुक्ति का प्रदाता है। वीर्य अत्यन्त अनमोल वस्तु है। इसी वीर्य के बल पर मनुष्य देवता बनता है और उसके नाश से वह पूर्ण पतित बन जाता है। विना ब्रह्मचर्य धारण किये हुए कोई भी पुरुष कदापि श्रेष्ठ पद को प्राप्त नहीं कर सकता। वीर्य-अष्ट पुरुष कदापि, पाषाणमा, धर्मात्मा व महात्मा नहीं हो सकता। विना ब्रह्मचर्य के प्रत्यक्ष इन्द्र भी तुच्छ और पददलित हो सकता है तब फिर सामान्य मनुष्यों की वातही क्या है ? अतः ब्रह्मचर्य ही हमारी संपूर्ण विद्या, वैभव और सौभाग्य का आदि कारण है ! ब्रह्मचर्य ही हमारी श्रेष्ठता, स्वतंत्रता