ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ अष्ट मैथुन ❁
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और सम्पूर्ण उन्नति का बीज मन्त्र है !! ब्रह्मचर्य ही हमारी सम्पूर्ण सिद्धियों का एकमात्र रहस्य है !!!
२-अष्ट मैथुन
“स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणं ।
संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रिया निष्पत्तिरेव च ॥
“एतन्मैथुनमष्टांगं प्रवदन्ति मनोपिणः ।
विपरीतं ब्रह्मचर्यं एतत् पवाप्नु लक्षणम् ॥ १ ॥
शास्त्र में ब्रह्मचर्य-नाश के आठ मैथुन बतलाये हैं:—( १ ) किसी जगह पढ़े हुए, सुने हुये या चित्र में वा अत्यन्त दृश्ये हुए स्त्री का ध्यान, चिन्तन वा स्मरण करना । ( २ ) स्त्रियों के रूप, गुण और अंग अत्यन्त का वर्णन करना—शृङ्गारिक गायन वा कजली गाना अथवा भड़ी बातें बकना । ( ३ ) स्त्रियों के साथ गेंद, ताश, शतरंज होली इत्यादि खेल खेलना । ( ४ ) किसी स्त्री की ओर गीध या ऊंट की तरह गर्दन उठा कर या घुमाकर पाप-दृष्टि से अथवा चोर-दृष्टि से देखना । ( ५ ) स्त्रियों में बार बार आना, जाना और उनके साथ एकान्त में बातचीत करना । ६ शृङ्गार-रस-पूर्ण वाहियात उपन्यास पढ़कर किंवा स्त्रियों के भड़े फोटो देखकर, अथवा नाटक वा सिनेमा के रद्दी कामचेश्ठापूर्ण दृश्य देखकर उन्हीं की कल्पनाओं में निमग्न रहना । ( ७ ) किसी अ-प्राप्य स्त्री की प्राप्ति के लिये व्यर्थ पापपूर्ण प्रयत्न करना । और ( ८ ) अत्यन्त संभोग । ये ही अष्ट मैथुन हैं । इन लक्षणों के विलकुल विरुद्ध लक्षण अखण्ड ब्रह्मचर्य के होते हैं । आदर्श ब्रह्मचर्य में इनमें का एक लक्षण वा मैथुन नहीं आना चाहिये । क्योंकि इनमें का कोई भी मैथुन किंवा लक्षण मनुष्य को नष्ट अष्ट करने में पूर्ण समर्थ है ।