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ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

❁ अष्ट मैथुन ❁

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और सम्पूर्ण उन्नति का बीज मन्त्र है !! ब्रह्मचर्य ही हमारी सम्पूर्ण सिद्धियों का एकमात्र रहस्य है !!!

२-अष्ट मैथुन

“स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणं ।

संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रिया निष्पत्तिरेव च ॥

“एतन्मैथुनमष्टांगं प्रवदन्ति मनोपिणः ।

विपरीतं ब्रह्मचर्यं एतत् पवाप्नु लक्षणम् ॥ १ ॥

शास्त्र में ब्रह्मचर्य-नाश के आठ मैथुन बतलाये हैं:—( १ ) किसी जगह पढ़े हुए, सुने हुये या चित्र में वा अत्यन्त दृश्ये हुए स्त्री का ध्यान, चिन्तन वा स्मरण करना । ( २ ) स्त्रियों के रूप, गुण और अंग अत्यन्त का वर्णन करना—शृङ्गारिक गायन वा कजली गाना अथवा भड़ी बातें बकना । ( ३ ) स्त्रियों के साथ गेंद, ताश, शतरंज होली इत्यादि खेल खेलना । ( ४ ) किसी स्त्री की ओर गीध या ऊंट की तरह गर्दन उठा कर या घुमाकर पाप-दृष्टि से अथवा चोर-दृष्टि से देखना । ( ५ ) स्त्रियों में बार बार आना, जाना और उनके साथ एकान्त में बातचीत करना । ६ शृङ्गार-रस-पूर्ण वाहियात उपन्यास पढ़कर किंवा स्त्रियों के भड़े फोटो देखकर, अथवा नाटक वा सिनेमा के रद्दी कामचेश्ठापूर्ण दृश्य देखकर उन्हीं की कल्पनाओं में निमग्न रहना । ( ७ ) किसी अ-प्राप्य स्त्री की प्राप्ति के लिये व्यर्थ पापपूर्ण प्रयत्न करना । और ( ८ ) अत्यन्त संभोग । ये ही अष्ट मैथुन हैं । इन लक्षणों के विलकुल विरुद्ध लक्षण अखण्ड ब्रह्मचर्य के होते हैं । आदर्श ब्रह्मचर्य में इनमें का एक लक्षण वा मैथुन नहीं आना चाहिये । क्योंकि इनमें का कोई भी मैथुन किंवा लक्षण मनुष्य को नष्ट अष्ट करने में पूर्ण समर्थ है ।

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

३-हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम

आजकल समाज में उपर्युक्त अष्ट मैथुनों के अलावा और भी एक मैथुन नवयुवकों में बड़े भीषणरूप से फैल गया है। इस मैथुन से तो बालकों का बड़ा ही भारी संहार हो रहा है; प्लेग और इनफ्लुएन्जा से कहीं बढ़कर यह नया रोग नवयुवकों को जान से मार रहा है। यही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े लिखे-पढ़े हुए लोग भी इस काल के कराल पंजे में 'मोहवश' जा रहे हैं। हा ! यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है। इस महारोग से पिण्ड छुड़ाना पूरे इन्फ्लुएन्जा से भी महा कठिन हो गया है। इस महारोग को "हस्तमैथुन"❁ का रोग कहते हैं। यह रोग बड़ा ही भयानक है ! यह राक्षस मनुष्य को बड़ी क्रूरता से विलकुल निचोड़ डालता है। यह भी एक प्रकार की स्त्री की नवविधा भक्ति ही है। फर्क इतना ही है कि परमात्मा की नवविधा भक्ति से मनुष्य की मुक्ति होती है और स्त्री की किंवा विषय की इस नवविधा भक्ति से मनुष्य को नरक की प्राप्ति होती है।

हस्तमैथुन के कारण जितनी हानियां, उठानी पड़ती हैं यदि केवल उनके नाम ही लिखे जायें तो एक छोटी सी पुस्तिका तैयार हो सकती है। हम यहां पर इस नष्टकारी कुटेव का संक्षेप में ही वर्णन करते हैं। किसी लकड़ी को घुन लगने से जैसे वह विलकुल खोखली पड़ जाती है वैसे ही इस अधम कुटेव से मनुष्य की अवस्था जर्जरभूत होती है।


*पापी मनुष्यों ने धीर्यनाश के धीरों तरीकों निकाले हैं। वे सब अप्राकृतिक व महानिष हैं। अतः वे सब हमने "हस्तमैथुन" में ही समाविष्ट किये हैं।

❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁

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हस्तमैथुन को अङ्गरेजी में ( Masturbation ) मास्टरबेशन कहते हैं। कोई इसे मुष्टिमैथुन, हस्त-क्रिया अथवा आत्म-मैथुन भी कहते हैं। हस्तमैथुन से इन्द्री की सब नसें ढीली पड़ जाती हैं। फल यह होता है कि स्नायुओं के दुर्बल होने से जननेन्द्रिय टेढ़ा, लघु व ढीला पड़ जाता है। मुख की ओर मोटा और जड़ की ओर पतला पड़ जाता है। इन्द्री पर एक नस होती है वह उभर आती है और मुँह के पास वाईं ओर कंटिया की तरह टेढ़ी बन जाती है। यह नितान्त नपुंसकता का चिन्ह है। ऐसे एक बालक को हमने स्वयं देखा है। नस-द्वैर्बल्य से बार बार स्वप्न-दोष होने लगता है। सामान्य कामसंकल्पों से ही अथवा शृङ्गारिक वर्णन, गायन वा दृश्य मात्र से ही ऐसे पतित पुरुष का वीर्य नष्ट होने लगता है। उसका वीर्य पानी की तरह इतना पतला पड़ जाता है कि स्वप्न-दोष के बाद वस्त्र पर उसका चिन्ह तक नहीं दिखाई देता। इन्द्री में वीर्यधारण करने की शक्ति नहीं रह जाती। ऐसा पुरुष स्त्री-समागम के सर्वथा अयोग्य बन जाता है।

शरीर के भीतर “मनोवहा” नामक एक नाड़ी है। इस नाड़ी के साथ शरीर की संपूर्ण नाड़ियों का सम्बन्ध है ! काम-भाव जागृत होते ही ये सब नाड़ियाँ काँप उठती हैं। और शरीर के पैर से सिर तक के सब यंत्र हिल जाते हैं; फिर रक्त का व संपूर्ण शरीर का मथन होकर वीर्य उनसे भिन्न होकर नष्ट होने लगता है जिससे धातु-द्वैर्बल्य, ग्रमेह, स्वप्न-मेह, मधुमेहादि कठिन रोग शरीर में घर कर लेते हैं।

शरीर के खून में एक सफ़ेद ( White corpuscle ) और दूसरे लाल ( Red corpuscle ) कीट होते हैं। सफ़ेद कीटों

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

में रोगों के कीटों से लड़ने की शक्ति होती है। वीर्य जितना ही पुष्ट व अधिक होता है उतने ही ये शुभ्र कोट महान् वलवान होते हैं और विष को भी पचा डालने की शक्ति रखते हैं। परन्तु ज्योंही वीर्य क्षीण होता है त्योंही ये कीट भी दुर्बल बनकर हैजा प्लेग, मलेरिया के कीटाणुओं से दब जाते हैं और फिर मनुष्य भी काल के गाल में प्रवेश करता है। ये वीर्यनाश के ही दारुण फल हैं।

हस्तमैथुन से जो वीर्यनाश किया जाता है उससे शरीर और दिमाग के समस्त स्नायुओं पर बड़ा भारी धक्का पहुँचता है। जिससे पश्चाघात, ग्रन्थिवात, सन्धिवात, अपस्मार-मृगी और पागलपन आदि भीपणरोगों की उत्पत्ति होती है। व्यभिचार तो सर्वथा निन्द्य है ही परन्तु उससे भी महानिन्द्य यह हस्तमैथुन का कर्म है। हस्तमैथुन द्वारा वीर्य के निकलने से कलेजे में विशेष धक्का लगता है। जिससे क्षय, खाँसी, श्वास; यक्ष्मा और “हार्ट डिजीज़” नामक महाभयानक हृदय-रोग हो जाते हैं। हृद्रोग से ऐसे अभागे मनुष्य की कौन से समय में मृत्यु होगी इसका कुछ भी निश्चय नहीं होता। अकाल ही में वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। मस्तिष्क पर तो विजली का सा धक्का लगता है। हस्तमैथुन से सिर फौरन हल्का और खाली पड़ जाता है। स्मृति (याददास्त) सु-बुद्धि, प्रतिभा सभी चौपट हो जाते हैं और अन्त में ऐसा नष्ट-वीर्य पुरुष पागल सा बन जाता है। पागल-खानों में सौ में ९५ आदमी व्यभिचार और हस्तमैथुन के ही कारण पागल बने होते हैं। यही हालत अपनी स्त्री से अति रति करने वालों की भी हुस्सा करती है।

- टारेन्टों के डाक्टर वर्कमन कहते हैं “सैकड़ों पागलखानों की जाँच करने पर हमें यही ज्ञात हुस्सा कि जिनको हम आप नीतिभ्रष्ट

❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁

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अशिचित व मूर्ख समझते हैं उनमें नहीं; किन्तु धर्म से व स्वच्छता से रहने वाले शिचित लोगों में ही यह हस्तमैथुन का रोग विशेष-रूप से फैला हुआ है।” खेतों में शारीरिक परिश्रम करने वालों मूर्खों में नहीं किन्तु शहरों के पुस्तक-कीट बने हुए नवयुवकों और आदमियों में ही यह घृणित रोग विशेष फैला हुआ है। माता-पिता इस भीतरी कारण को नहीं जानते। वे समझते हैं कि परिश्रम की अधिकता से ही बालकों की ऐसी दुर्दशा हुई है ! मस्तिष्क कमजोर होते ही आँखों की ज्योति और कान व दाँत की शक्ति भी कमजोर हो जाती है। बाल झड़ने और पकने लगते हैं। राजा के घायल होते ही जैसे संपूर्ण सेना एक वारगी घबड़ा जाती है उसी प्रकार वीर्यरूपी राजा को आघात पहुँचते ही शरीर की इन्द्रियरूपी सेना एक वारगी अस्वस्थ व कमजोर हो जाती है। आँख, कान, नाक, जिह्वा, वाणी, हाथ, पैर, त्वचा, आँतें और मलमूत्रेन्द्रिय अपना काम करने में असमर्थ हो जाती हैं फिर ऐसे पुरुष का बहुत जल्द नाश होता है।

हस्तमैथुन से संपूर्ण शरीर पीला, ढीला, फीका, दुर्बल व रोगी बन जाता है। मुख-कान्ति हीन व पीली पड़ जाती है। ऐसा पुरुष जीवित रहते हुये भी मुर्दा होता है ! हाय ! जिस विषयानन्द को कामी लोग ब्रह्मानन्द से भी बढ़कर समझते हैं, वह विषयानन्द भी ऐसे पतित पुरुष ज्यादा दिन तक नहीं भोग सकते। इन्द्रिय दुर्बलता के और अन्यान्य रोगों के कारण वे गाहैस्थ्य सुख भी नहीं भोग सकते। उनकी सन्तानोत्पादन शक्ति नष्ट हो जाती है। जिससे इनकी स्त्रियाँ-बन्ध्या बनी रहती हैं। अथवा सन्तान हुई तो कन्या ही कन्या होती हैं। ऐसे लोग काम के मारे वैकाम बन जाते हैं।

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❖ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❖

सन्ततिमुख से वे हाथ धो बैठते हैं। उनकी स्त्रियों को कभी सन्तोष नहीं होता है ! फिर वे व्यभिचार करने लगती हैं। स्त्रियों के विगड़ने से सन्तान भी दुःसाध्य होती है व अधर्म की वृद्धि होती है। अधर्म के फैलते ही घर में व देश में दारिद्र्य, अकाल व अशान्ति आदि फैलते हैं। फिर सुख की आशा कहाँ ? अन्त में सब कुल नरकगाभी होता है। ( गीता अ० १ ला श्लोक ४१ से ४४ देखो ) इस महा पाप के मूल कारण व भागी दुराचारी पुरुष ही होते हैं।

हाय ! यह बड़ा ही अधर्म और दुष्ट कर्म है। जिस अभागे को इसके करने का एक चार भी दुर्भाग्य प्राप्त हुआ तो धीरे धीरे यह “शैतान” हाथ धोकर उसके पीछे पड़ जाता है, वहाँ तक कि प्राण बचना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे पुरुष इस महानिन्द कुट्टेव के पूर्ण गुलाम बन जाते हैं। दुर्बल चित्त के कारण इच्छा करने पर भी वे संयम नहीं कर सकते। हजारों प्रतिज्ञायें करने पर भी एक भी प्रतिज्ञा पूरी नहीं होने पाती। विषयों के सामने आते ही सभी प्रतिज्ञायें ताक पर धरी रह जाती हैं। इस प्रकार वीर्य को नष्ट करने से मनुष्य का मनुष्यत्व लोप हो जाता है। और उसका जीवन उसी को भारस्वरूप मालूम होने लगता है। आबोधवा का परिवर्तन थोड़ा भी सहन नहीं होता। हर समय सदी गर्मी मालूम होने लगती है, जुकाम, सिर-दर्द और छाती में पीड़ा होने लगता है। ऋतुओं के बदलते ही उसके स्वास्थ्य में भी फर्क होता है और अन्यान्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं। देश में जब कभी बीमारी फैलती है तब सबसे पहले ऐसा ही पुरुष बीमार पड़ता है और अक्सर वही काल का शिकार बनता है।

❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁

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हा ! ऋषि-सन्तानों के दिव्यनेत्र व ज्ञाननेत्र सब नष्ट हो गये हैं और उनको अब उपनेत्र के बिना देखना भी मुश्किल हो गया है। अज्ञान की घनघोर घटा भारत-आकाश को चारों ओर से आन्धल कर रही है। आर्य-सन्तान आज पूर्णतया तेजोहीन व गुलाम बन कर भारत माता का सुख कलंकित कर रहे हैं ! हा ! शोक !! शोक !!! शोक !!!

वस, अब हम इससे अधिक वर्णन करना नहीं चाहते। केवल वीर्यभ्रष्टता के प्रमुख चिन्ह ही कह कर इस विषय को समाप्त करते हैं, जिससे कि हम लोग पतित बालक, बालिका, व स्त्री-पुरुष को फौरन पहचान सकें।

वीर्यनाश के मुख्य लक्षण।

(१) काम पीड़ित वीर्यधन ( वीर्य को नष्ट करने वाला ) बालक बड़े आदमियों की तरफ आँख से आँख मिला कर नहीं देख सकता। किसी अपराधी की तरह शर्मिन्दा होकर नीचे देखता है अथवा इधर उधर मुंह छिपाना चाहता है।

(२) बहुत से चालाक या धूर्त लड़के भूठे ही छाती निकाल कर समाजमें इतस्ततः ऐंठते हुए अकड़ कर घूमा करते हैं। वे ज़रूरत से अधिक ठीठ बन जाते हैं; हेतु यह कि ऐसा करने से उनके दुर्गुण छिप जायेंगे और लोगों की दृष्टि में वे निर्दोष जचेंगे।

(३) उसका आनन्दमय व हँसमुख चेहरा दुःखी व उदास बन जाता है। सूरत रौनी बन जाती है। प्रसन्न-स्वभाव नष्ट होकर चिड़चिड़ा, क्रोधी व रुच (रुखा) बन जाता है। चेहरा फीका, पीला व मुर्दे की तरह निस्तेज बन जाता है।

(४) गालों पर की पहले की वह गुलाबी छटा नष्ट होकर गालों

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

पर भाई पड़ने (काले दाग पड़ना) लगती है। यह अत्यन्त वीर्यनाश का निश्चित लक्षण है।

(५) आँखें व गाल अन्दर धँस जाते हैं और गाल की हड्डियाँ खुल जाती हैं।

(६) बाल पकने व भड़ने लगते हैं। मूछें पीली व सुर्ख यानी लाल बन जाती हैं। चारह वर्ष के उपरान्त बाल का सफेद होना वीर्यनाश का स्पष्ट लक्षण है।

(७) कोई भी रोग न रहते हुए अकाल ही में वृद्ध पुरुष की तरह जर्जर, दुर्बल व ढीले बनना; किसी अच्छे काम में दिल न लगना व नाताक्रुत बनना तथा थोड़े ही परिश्रम से व दौड़ने से हँफने लगना और मृतपिण्ड की तरह उत्साहहीन बनना; दैनिक काम करना भी अच्छा न लगना; सामान्य से सामान्य काम भी कठिन जान पड़ना।

(८) चित्त में कुचिन्ताओं का बढ़ना। थोड़े ही डर से छाती में वेहद थडकन आना तथा भयभीत हो जाना। थोड़ा सा भी दुःख पहाड़ सा मालूम होना।

(९) बार बार भूठी ही अस्वाभाविक भूख लगना अथवा भूख का मन्द पड़ जाना, यह भी वीर्यनाश का प्रमुख चिन्ह है। अपच और मलबद्धता (कञ्जियत) इसका निश्चित परिणाम है। चरपर मसालेदार पदार्थ खाने में अधिक रुचि रखना।

(१०) नींद का न आना; यदि आई तो ऐसी आना जैसी कुम्भकर्ण की निद्रा जैसी। उठते समय महा आलस्य व निरुत्साह मालूम करना और आँखों का भारी पड़ना।

❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁

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(११) रात्रि में स्वप्रदोष होना, यह पापी वा कामी मन का पूर्ण लक्षण है ।

(१२) वीर्य का पानी जैसा पतला पड़ना और पेशाब के बक्त वीर्य का बूँद बूँद बाहर निकलना, यह भी हस्तमैथुन का एक मुख्य चिन्ह है । इसका अन्तिम भयानक परिणाम पुरुषत्व का नाश अर्थात् नपुंसकता है ।

(१३) बार बार पेशाब होना तथा गरमी, परमा, प्रमेहादि उग्र रोग होना ।

(१४) हाथ पैर और शरीर के पोर पोर में ( सन्धि में ) दर्द मालूम होना । हाथ पैरों में शिथिलता, जड़ता व सनसनी उत्पन्न होना तथा उनका मुर्दे की तरह ठंड पड़ जाना ।

(१५) तलुवे तथा हथेलियों का पसीजना, यह वीर्य-अष्टता का मुख्य लक्षण है ।

(१६) हाथ पैरों में कंप मालूम होना, ( हाथ में पकड़ा हुआ काराज व कोई वस्तु हिलने लगना, हाथ काँपना )

(१७) नाटक उपन्यास आदि शृङ्गारिक किताबें तथा चित्र पढ़ने व देखने की अत्यन्त रुचि रखना ।

(१८) स्त्रियों में बार बार आना जाना; निर्लज्जता से गीध व ऊँट की तरह सर उठाकर या घुमाकर किंवा चोर-टुष्टि से झिपकर स्त्रियों की तरफ देखना ।

(१९) चेहरे पर पिटिका ( मुहरसा ) उभड़ना यह पापी व कामी मन का पूर्ण लक्षण है ।

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

(२०) किसी समय ऊपर उठते समय एकाएक दृष्टि के सामने अन्धेरा छा जाना तथा मुर्छा आने से नीचे गिर पड़ना ।

(२१) मस्तिष्क का विलकुल हलका व खाली पड़ना । स्मरण शक्ति का हास होना । देखे हुए स्वप्न का याद न आना । रक्खी हुई वस्तु का स्मरण न होना और कण्ठ की हुई कविता या पाठ भी भूल जाना और मानसिक दुर्बलता का बढ़ जाना ।

(२२) आबो हवा का परिवर्तन न सहा जाना ।

(२३) चित्त का अत्यन्त चंचल, दुर्बल, कामी व पापी बनना और कोई भी प्रतिज्ञा पूरी न कर सकना तथा सब काम अधूरे ही कर के छोड़ देना । एक भी अच्छा काम पूर्ण न करना, परं कुकर्म प्रयत्न पूर्वक पूरा करना । गिरगिट की तरह सदा विचार व निश्चय बदलते रहना और सदा मन मलीन व नाशक बने रहना ।

(२४) दिमाग में गर्मी छा जाना । नेत्रों में जलन उत्पन्न होना व नेत्रों से पानी बहने लगना ।

(२५) क्षण ही में रुष्ट व क्षण ही में तुष्ट होना ।

(२६) माथे में, कमर में, मेरुदण्ड में और छाती में बार बार दर्द उत्पन्न होना ।

(२७) दाँत के मसूड़े फूलना । मुख से महान् दुर्गन्धि का आना तथा शरीर से भी ❁ बदबू निकलना । वीर्यवान् के शरीर से सुगन्धि निकलती है । (अतः दाँत को विलकुल साफ रखना चाहिये ।)


*दुर्गन्धो भोगिनो देहे जायते धिन्दुसंक्षयात् ।

श्री शिवदास वामन

❁ माता-पिताओं का कर्तव्य ❁

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(२८) मेहदण्ड का मुक जाना; फिर हर वृक्ष मुक कर बैठना ।

(२९) वृषण की बृद्धि होना तथा उनका विशेष लटक जाना ।

(३०) आवाज की कोमलता नष्ट होकर आवाज मोटा, रुखा व अप्रिय बन जाना ।

(३१) छाती का दुर्भंग हो जाना अर्थात् छाती पर का अंतर गहरा और विस्तृत बन जाना । और छाती की हड्डियाँ दीखना ।

(३२) नेत्ररूपी चन्द्र-सूर्य को ग्रहण लगना । नाक के कोने में प्रथम कालिमा छा जाती है, फिर बढ़ते बढ़ते आँखों के चतुर्दिक ग्रहण लग जाता है अर्थात् चारों ओर से नेत्र काले पड़ जाते हैं । यह अत्यन्त वीर्यनाश का बड़ा भयानक और भीषण चिन्ह है ।

(३३) किसी बात में कामयाबी न होना तथा सर्वत्र निन्दित व अपमानित बनना यह वीर्यनाश की पूरी निशानी है । सन्तति-सम्पत्ति का धीरे धीरे नाश होना, अधर्म, व्यभिचार व पाप का बढ़ता; आयु का घट जाना; वेदशास्त्राज्ञाओं को कुछ भी न मानना और अपनी ही मनमानी करना अर्थात् “विनाश काले विपरीत बुद्धिः” इस न्याय से सब उलटी ही बातें करना यह गुलामी के खास चिन्ह हैं । सम्पूर्ण अपयश, दुःख व गुलामी का कारण एक मात्र वीर्य का नाश ही है ।

(३४) अन्त में कभी कभी दुःख और पश्चाताप के मारे आत्महत्या करने का भी विचार करना । इति प्रमुख विह्वानि ।

४-माता-पिताओं का कर्तव्य

प्रत्येक माता, पिता, गुरु, वन्धु तथा मित्र का सब से प्रथम कर्तव्य अब यही होना चाहिये कि यदि उपर्युक्त लक्षणों में कोई

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

भी एक-दो लक्षण पुत्र-पुत्री और शिष्य-मित्रोंमें दिखाई दें तो फौरन उन के सामने पाप के परिणाम का भीषण चित्र तथा ब्रह्मचर्य की श्रेष्ठमहिमा स्पष्ट शब्दों में रखनी चाहिए । इसमें लज्जा संकोच करना तथा अपमान समझना मानो अपनी सन्तान का पूर्ण नाश ही करना है । “शरीरं व्याधि मन्दिरम् ” तब ही बनता है जब कि मनुष्य ब्रह्मचर्य के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करता है । अतः उन्हें उन नियमों का अवश्य ज्ञान करा देना चाहिये । माता, पिता व गुरु ब्रह्मचर्य का पूर्ण स्पष्ट वर्णन करने में लजाते हैं ! परन्तु यह उनकी भारी भूल एवं मूर्खता है । अपने पर वीती हुई दुर्घटनाओं को, जिनके दुष्परिणाम माता-पिता तथा गुरुजनों को आज भी उनकी मर्जी के विरुद्ध भोगने पड़ रहे हैं, लड़कों से साफ साफ कहें और उनसे बचे रहने के लिये अपने अनुभूत इलाज को स्पष्ट बतलायें अथवा यह जीवन पथप्रदीप ग्रन्थ अपने प्रिय बालकों, शिष्यों अथवा मित्रों के हाथ में रख दें, जिससे उनका कर्तव्यमार्ग उन्हें साफ दिखाई दे ।

कई लोग यह समझते हैं कि यदि बालकों के सामने ब्रह्मचर्य की रक्षा के हेतु हस्तमैथुन शिशुमैथुनादि महानिन्द्य वुराइयों का वर्णन करे, तो वे यदि न भी जानते होंगे तो इन दुर्गुणों को जान लेंगे परन्तु यह धारणा विलकुल बृथा व नाशकारी है । यदि आप न कहेंगे तो बालक कुसंगों में पड़ कर दूसरों से अवश्य ही उपर्युक्त दुर्गुण सीख लेंगे । परन्तु वुराइयों का तीव्र निषेध व ब्रह्मचर्य की उज्ज्वल महिमा आप वर्णन करेंगे तो आपके बालक अवश्य ही सदाचारी व ब्रह्मचारी बनेंगे ऐसा पूर्ण विश्वास रखेंगे । गन्दगी या गडदे को ढाकने के वनिस्वत उससे बचे रहने का ज्ञान करा

❁ वैद्य व डाक्टर ❁

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देना ही बुद्धिमान्नी व सुरक्षितता है और यही माता-पिता तथा गुरुजनों का पवित्र कर्तव्य है। यदि गुरुजन अच्छे अच्छे कामों द्वारा अच्छे ढंग से बालक-बालिकाओं को ब्रह्मचर्य की केवल पन्द्रह मिनट स्कूलों में या घर ही पर बढ़िया शिक्षा दें, तो क्या ही अच्छा हो? हम पूर्ण विश्वास से कह सकते हैं कि भारत का इससे अति शीघ्र उद्धार हो सकता है। अतः माता-पिताओं ! सावधान !!

५—वैद्य व डाक्टर

माता-पिता तथा गुरुजनों की लापरवाही के कारण कई अच्छे बालक कुसंग में पड़कर विगड़ जाते हैं। वीर्य-नाश व व्यभिचार के कारण वे अनेकानेक दारुण रोगों से आक्रान्त हो जाते हैं; फिर वे वैद्य व डाक्टरों के मकान व दूकान छिपे छिपे दूँढ़ने लगते हैं। कोई मदनमंजरी पिल्स, धातुपुष्टि की गोलियाँ, वीर्यगुटिका, नपुंसकारिघृत, कोई जड़ी, बूटी, लेह, पाक चूर्ण आदि दूर दूर से मँगवाते हैं; और बेचारे लाभ की जगह, और भी तन से, मन से व धन से वर्वाद हो जाते हैं; इसका कारण यह है कि जितनी धातु-पौष्टिक औषधियाँ होती हैं वे सब कामोत्तेजक होती हैं; उनके सेवन से शरीर में यदि कुछ ताकत भी दीख पड़ती हो तो यह केवल मनुष्य की भावना तथा उस औषधि के साथ खाने हुये दूध मलाई आदि का प्रभाव है। संसार में ऐसा कोई भी वैद्य समर्थ नहीं है कि जो द्वादर्पन द्वारा वीर्यहीन को वीर्यवान् अर्थात् ब्रह्मचारी बना सकता हो। यदि कोई ऐसा कहें

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

तो उसकी धृष्टता एवं मूर्खता है। एक मात्र शुद्ध मन ही मनुष्य को ब्रह्मचारी पद वीर्य धारण करने के लिये समर्थ बना सकता है। दवा-दर्पण कदापि नहीं इनसे तो वीर्य का औरभी नाश होता है।

आजकल जिसे देखो वही वैद्य बन बैठा है। 'बूढ़ा भी जवान हो गया' 'मुर्दा भी ज़िन्दा हो गया' 'अजब ताकत की दवा' ऐसे ऐसे भूठे विज्ञापन, का मोहजाल फैलाकर वेश्याओं की तरह बाल-बालिकाओं को तन से, मन से, धन से, व प्राण से ये वैद्य बरबाद कर रहे हैं। प्यारे भाइयों, ऐसे स्वार्थान्व वैद्यों से बचे रहो। सुयोग्य वैद्यों तथा माता पिता व गुरुजनों के सामने अपने रोग का स्पष्ट वर्णन करके उनसे उचित सलाह लो। बहुत सी औषधियाँ अन्य रोगों के लिये भी दिव्य गुणकारी होती हैं; परन्तु एक मात्र विशुद्ध मन सम्पूर्ण संसार में वीर्य-रक्षा के लिये दिव्यौषधि है। अन्य सब उपाय वृथा व आनुपंगिक हैं।

जब रोगियों के बारे में वैद्यों का कुछ भी वश नहीं चलता तो अन्त में जल-त्रायु परिवर्तन के लिए ही उन्हें सलाह दी जाती है; परन्तु उसके पहले वे रोगियों को खूब लूट लेते हैं। सचमुच शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध व पवित्र भूमि, विपुल प्रकाश व विपुल अवकाश वस ये ही इस लोक के पश्चाभूत हैं। इसी का सेवन करने से हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि इतने दीर्घायु, आरोग्य-संपन्न ज्ञानी पवित्र-मानस व सामर्थ्य-सम्पन्न होते थे। यदि हम भी इसी "पंचामृत" का यथेष्ट सेवन "रोज नियम पूर्वक" किया करेंगे तो हम भी उनके समान निःसंदेह श्रेष्ठ बन जायेंगे।

❁ ब्रह्मचर्य व आरोग्य ❁

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६—ब्रह्मचर्य व आरोग्य

“धर्मार्थ काम मोक्षाणां आरोग्यं मूलमुत्तमम् ।

रोगाः तस्याऽपहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च” ॥ १ ॥

एक मात्र आरोग्य ही चारों पुरुषार्थों का सर्वोत्तम मूल है और रोग उन चारों को भी नष्ट कर डालते हैं; यही नहीं किन्तु जीवन को भी अकाल ही में चिन्ता और चिंता पर चढ़ा देते हैं ।

सच है रोगी पुरुष किसी काम का नहीं होता । वह सब के लिये बोझ स्वरूप बन जाता है । रोगी संसार और परमार्थ दोनों में नालायंक बनता रहता है । रोगी मनुष्य के लिये सब संसार शून्य बन जाता है । उसके लिये भोग-विलास की सम्पूर्ण चीजें भी दुःखदायी बन जाती हैं । रोगी पुरुष चाहे राजभवन में रहे चाहे हिमालय जाय—कहीं भी सुखी नहीं हो सकता । उसकी रोगी सूत्र तब ही मिट सकती है कि वह या तो मिट्टी में मिल जाय अथवा प्रकृति के अनुसार पुनः शुद्ध वर्तार करने लग जाय ।

निसर्ग के राज्य में मूलतः प्रत्येक प्राणी निस्सीम निरोगी, परम सुन्दर सब प्रकार से पूर्ण तथा अन्वयंग पैदा होता है; परन्तु स्वयं लोग ही अपने दुष्कृतियों द्वारा अपने दिव्य स्वरूप को, बढ़िया आरोग्य को और सुडौल शरीर को बिगाड़ डालते हैं । “जो जस करड़ सो तस फल चाखा” यह अमिट सिद्धान्त है । सम्पूर्ण विश्व में ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है कि जो हमें हमारी इच्छा के विरुद्ध रोगी या निरोग बन सकता हो । गिद्ध, चील, कन्ने वगैरह उसी स्थान पर जाते हैं, जहाँ पर कोई सड़ा जानवर पड़ा रहता है; उसी तरह रोग, शोक और दुःख उसी शरीर में प्रवेश करते हैं जहाँ पर

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❧ ब्रह्मचर्य ही जीवन ❧

उनका स्वाद्य उन्हें मिलता है। आज कल के ब्राह्मण किसी मरे हुए बड़े सेठ के यहाँ जैसे फॉरन विना बुलाये दौड़े आते हैं; वैसे ही रोग, शोक दुःखादि भी नष्ट-वीर्य-पुरुष के यहाँ फॉरन चले आते हैं। परन्तु आरोग्य, सुख, शान्ति, समृद्धि, आनन्द इनका हाल ऐसा नहीं है, वे बड़े ही मानी हैं। दुराचारी व्यभिचारी पुरुषों से वे कोसों दूर रहते हैं; केवल सदाचारी ब्रह्मचारी पुरुषों के ही यहाँ वे वास करते हैं। ब्रह्मचारी पुरुषों को कोई भी रोग नहीं सता सकता प्लोग कालरा भी उनका कुल्ल नहीं कर सकते। सब कोई दुर्बलों को ही मारते हैं। बलवान को कोई सता नहीं सकता। “द्वैषो दुर्बल घातकः”। वस, यही प्रकृति का कायदा है। अतः हमको अब सब तरह से बलवान ही बनना होगा, क्योंकि बलवान ही राजा है, चाहे वह भले ही निर्धन हो। रोगी पुरुष राजा होने पर भी भिखारी और पूर्ण अभागा समझना चाहिये। “तन्दुरुस्ती दृञ्जार न आमत है।” भोगी पुरुष सदा रोगी ही बना रहता है, वह कभी भी योगी यानी सुखी नहीं हो सकता, वह सदा वियोगी अर्थात् दुःखी ही बना रहता है। व्यभिचारी पुरुष कदापि निरोग और बलवान नहीं हो सकता। एक मात्र वीर्यवान ही बलवान, आरोग्यवान, भक्त और भाग्यवान हो सकता है। वीर्यतट पुरुष सदा रोगी दुःखी, पापी और अभागा ही बना रहता है। उसका उद्धार, फिर से वीर्यधारण किये विना सात जन्म में भी होना असम्भव है।

संसार में तीन बल हैं—एक शरीरबल, दूसरा ज्ञानबल और तीसरा मनोबल। इन तीनों बलों में मनोबल अर्थात् आत्मबल सब से श्रेष्ठ बल है। वगैर आत्मबल के और सब बल वृथा हैं।

❁ ब्रह्मचर्य व आरोग्य ❁

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वाहुबल, सैन्यबल, द्रव्यबल, नीतिबल, मतिबल, धृतिबल, निश्चयबल, चारित्र्यबल, धर्मबल, ब्रह्मबल, वगैरह जितने बल संसार में मौजूद हैं, सब इन्हीं तीनों बलों के अन्तर्गत हैं। इनमें सबसे पहिली सीढ़ी 'शरीर-बल' की है वगैर निरोग शरीर के ज्ञानबल और आत्मबल प्राप्त नहीं हो सकते। शरीरबल ही हमारे सम्पूर्ण बलों का एक मात्र मूलधार है। अतएव हमें व्यायाम और ब्रह्मचर्य द्वारा सब से प्रथम शरीर सुधार अवश्य कर लेना चाहिये।

आज हमें भारत के उत्थान के लिये आत्मबल अर्थात् चरित्र-बल की तो मुख्य आवश्यकता है ही; परन्तु उसके साथ ही साथ शारीरिक बल और ज्ञानबल की भी अत्यन्त अनिवार्यरूप से आवश्यकता है। शरीर बल न होगा तो हम संसार-संग्राम में विजय प्राप्त नहीं कर सकेंगे। दुर्बलता के कारण हम दूसरों के तथा काम क्रोध रोगादि वैरियों के सदा दास ही बने रहेंगे। हमारे घर में यदि कोई जबरदस्ती से घुस गया हो तो उसे बाहर घसीट कर ले जाने के लिये हमारे में शरीर बल का ही होना परम इष्ट है। वगैर शरीर बल के वह डाकू खुशी से बाहर नहीं निकलेगा। अतः शरीरबल प्राप्त करना सब से प्रथम ध्येय होना चाहिये। क्योंकि शरीरबल ही सब ध्येयों का मुख्य आधार है। वगैर शरीर सुधार के हम किसी अवस्था में सुखी और स्वतन्त्र नहीं हो सकते और न किसी काम में सिद्धि ही प्राप्त कर सकते हैं। शरीर रोगी होने पर संसार का कोई भी पदार्थ व व्यक्ति हमें कभी सुखी व शान्त नहीं बना सकता। केवल हम ही अपने को एक मात्र सुखी, स्वतंत्र और शान्त बना सकते हैं। अतएव शरीर सुधार हमारा प्रथम लक्ष्य होना चाहिये। क्योंकि यही

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

चारों पुरुषार्थों का मुख्य मूल है; और इसी में हमारी सुक्ति किंवा स्वतन्त्रता भरी हुई है।

“Sound Mind in a Sound Body” यानी “शरीर सुखी और पुष्ट है तो आत्मा भी सुखी और पुष्ट है और शरीर दुखी और दुर्बल है तो आत्मा भी दुखी और दुर्बल है,” यही प्रकृति-शास्त्र का नियम है, शरीर निरोग होने पर हमारी आत्मा भी अत्यन्त निर्मल, बली और सामर्थ्य-संपन्न बन जाती है। रोगी शरीर में आत्मा की उन्नति का होना कठिन है। अतएव प्रकृति के नियमानुसार चलकर सदाचरण द्वारा ब्रह्मचारी बन, अपना शरीर सुधार लेना हमारा सब से प्रथम और श्रेष्ठ कर्तव्य है।

हमारा केवल यही एक मात्र शरीर नहीं है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण, ऐसे हमारे चार शरीर हैं और इनके अतिरिक्त हमारे इस शरीररूपी साम्राज्य में असंख्य शरीरधारी कीटाणुओं की सेना सर्वत्र भरी हुई है, जो कि हमारी रात-दिन रक्षा कर रही है। इन सब का अधिष्ठाता आत्मा उनका राजा है। विजय उसी राजा की होती है जिसकी सेना बलवान और प्रचण्ड है। ठीक यही हालत हमारे शरीररूपी सेना की और आत्मारूपी राजा की समझिये।

७-ब्रह्मचर्य के विषय में प्रमाद

आज हिन्दू जाति इतनी पतित क्यों हुई है ! वह इतनी रोगी, दुर्बल, निरुत्साही, मूर्ख और अल्पायु क्यों हुई है। जिस भारतवर्ष में भीष्म पितामह और हनुमान जैसे शरवीर, गंभीर, धीर और

❁ ब्रह्मचर्य के विषय में प्रसाद ❁

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ज्ञानी ब्रह्मचारी हुये हैं; जहाँ पर व्यास, वशिष्ठ, वाल्मीक, गौतम, भरद्वाज, अत्रि, पराशर जैसे त्रिकाल ज्ञान के समुद्र हुये हैं, जहाँ पर धर्मराज, शिव, दधीचि, हरिश्चन्द्र, कर्ण और वलि जैसे महान् प्रतापी, सत्यमूर्ति, धर्मावतार हुये हैं; जहाँ पर नीति, न्याय, मर्यादा के पालनेवाले बड़े बड़े शूरवीर रणधुरन्धर, जनक, परिचित, दशरथ, रघु जैसे राजे महाराजे हुये हैं; जहाँ पर विश्वामित्र, भरत, भगीरथ जैसे निस्सीम कठोर व्रत के व्रतधारी महात्मा हुये हैं; जहाँ पर शुक्र, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार जैसे ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मचारी तपस्वी हो गये हैं; जहाँ पर राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और धर्मराज, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेवादि तथा श्रीकृष्ण, वलरामादि जैसे अत्यन्त तेजस्वी-ओजस्वी, आज्ञाकारी, सुपुत्र और सहोदर हो गये हैं; जहाँ पर सीता, सावित्री अनसूया, दमयन्ती, शकुन्तला, रुक्मिणी, द्रौपदी, लोपासुद्रा, मैत्रयी, गांधारी जैसी महान् पतिनिष्ठा और अत्यन्त तेजस्वी सती स्त्रियाँ हो गयी हैं; जहाँ ध्रुव, लव, कुश, महलाद, अभिमन्यु और भरत जैसे महान् तेजस्वी, ओजस्वी और सामर्थ्य-संपन्न सिंहशावक से बालक हुये हैं—उसी वीरप्रसू भारतभूमि में हम उन्हीं की सन्तान आज ऐसी नीच, पतित, दुर्बल, रोगी, मूर्ख, अन्धायु, परतंत्र और पूर्णतया अभारी क्यों हुई हैं ! इसका असली कारण क्या है ? हमको ऐसा नीच परतन्त्र और दुर्भाग्यी बनाने वाले हमारे दुर्धर शत्रु कौन हैं ! !....ठहरिये ! जरा भगवद्वाणी को प्रथम सुन लीजिये; साथ ही तुलसी वचन को भी देखिये

“आत्मैव ह्यारमनो बन्धुरारमैव रिपुरात्मनः ॥”

“काहु न कोउ सुख दुखकर दाता, निजकृत कर्म भोग सब आता”

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

क्या हमारे शत्रु हम ही हैं और हमारे मित्र भी हम ही हैं ? क्या हमारे ही कृत कर्मों से हमें ऐसी नीच दशा प्राप्त हुई है ? हाँ, भगवद्वाणी तथा संतवाणी हमें यही बतला रही है ! “तुम ही अपने मित्र हो तथा तुम ही अपने शत्रु भी हो, अपने पतन के कारण केवल तुम्हें ही हो ।”

सत्य है ! नीति न्याय मर्यादा का उल्लंघन करने ही से अर्थात् अधर्म और अन्याय बढ़ने ही से आज हमारी ऐसी पतित हालत हुई है; जैसे हम अपने को कुकर्मों द्वारा पतित बना सकते हैं वैसे ही सुकर्मों द्वारा अपना उद्धार भी कर सकते हैं । उन्नति के लिये अब हमें धर्मका आचरण अवश्य ही अति शीघ्र शुरु करना होगा ! श्री गीतादेवी के सच्चे अध्ययन की आज हमें नितान्त आवश्यकता है । आज हमें सच्चे कर्मवीरों की बड़ी ही जरूरत है । वीर्यभ्रष्ट कच्चे कर्मवीर बड़े ही घातक होते हैं; वीच ही में किसी डर के कारण अपनै कर्तव्य को छोड़ भागने वाले पुरुष बड़े कायर और नामर्द होते हैं । “काम मर्दों का नहीं जो कि अधूरा करना, जो बात ज्यों से निकाले उसे पूरा करना ।” वस ऐसे ही मर्द पुरुष की आज भारत को जरूरत है । नामर्द और व्यभिचारी पुरुष का अब यहाँ कुछ भी काम नहीं है । क्योंकि ऐसे लोग देश के घोर शत्रु होते हैं । वीर्यनाश के कारण आज तक बहुत कुछ नाश हो चुका है । अब हमें अपने पूर्वजों का अनुकरण अति शीघ्र करना होगा और दुराचार को छोड़ पूर्ण सदाचारी और ब्रह्मचारी बनना होगा । ‘हमारे बाबा ऐसे थे और वैसे थे, ऐसा कोरा अभिमान और कोरी बातें हमें अब साफ छोड़ देनी होगी । उनकी जैसी प्रत्यक्ष करनी ही करके हमें अब दिखलाना