भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

चारों पुरुषार्थों का मुख्य मूल है; और इसी में हमारी सुक्ति किंवा स्वतन्त्रता भरी हुई है।

“Sound Mind in a Sound Body” यानी “शरीर सुखी और पुष्ट है तो आत्मा भी सुखी और पुष्ट है और शरीर दुखी और दुर्बल है तो आत्मा भी दुखी और दुर्बल है,” यही प्रकृति-शास्त्र का नियम है, शरीर निरोग होने पर हमारी आत्मा भी अत्यन्त निर्मल, बली और सामर्थ्य-संपन्न बन जाती है। रोगी शरीर में आत्मा की उन्नति का होना कठिन है। अतएव प्रकृति के नियमानुसार चलकर सदाचरण द्वारा ब्रह्मचारी बन, अपना शरीर सुधार लेना हमारा सब से प्रथम और श्रेष्ठ कर्तव्य है।

हमारा केवल यही एक मात्र शरीर नहीं है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण, ऐसे हमारे चार शरीर हैं और इनके अतिरिक्त हमारे इस शरीररूपी साम्राज्य में असंख्य शरीरधारी कीटाणुओं की सेना सर्वत्र भरी हुई है, जो कि हमारी रात-दिन रक्षा कर रही है। इन सब का अधिष्ठाता आत्मा उनका राजा है। विजय उसी राजा की होती है जिसकी सेना बलवान और प्रचण्ड है। ठीक यही हालत हमारे शरीररूपी सेना की और आत्मारूपी राजा की समझिये।

७-ब्रह्मचर्य के विषय में प्रमाद

आज हिन्दू जाति इतनी पतित क्यों हुई है ! वह इतनी रोगी, दुर्बल, निरुत्साही, मूर्ख और अल्पायु क्यों हुई है। जिस भारतवर्ष में भीष्म पितामह और हनुमान जैसे शरवीर, गंभीर, धीर और