ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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वाहुबल, सैन्यबल, द्रव्यबल, नीतिबल, मतिबल, धृतिबल, निश्चयबल, चारित्र्यबल, धर्मबल, ब्रह्मबल, वगैरह जितने बल संसार में मौजूद हैं, सब इन्हीं तीनों बलों के अन्तर्गत हैं। इनमें सबसे पहिली सीढ़ी 'शरीर-बल' की है वगैर निरोग शरीर के ज्ञानबल और आत्मबल प्राप्त नहीं हो सकते। शरीरबल ही हमारे सम्पूर्ण बलों का एक मात्र मूलधार है। अतएव हमें व्यायाम और ब्रह्मचर्य द्वारा सब से प्रथम शरीर सुधार अवश्य कर लेना चाहिये।
आज हमें भारत के उत्थान के लिये आत्मबल अर्थात् चरित्र-बल की तो मुख्य आवश्यकता है ही; परन्तु उसके साथ ही साथ शारीरिक बल और ज्ञानबल की भी अत्यन्त अनिवार्यरूप से आवश्यकता है। शरीर बल न होगा तो हम संसार-संग्राम में विजय प्राप्त नहीं कर सकेंगे। दुर्बलता के कारण हम दूसरों के तथा काम क्रोध रोगादि वैरियों के सदा दास ही बने रहेंगे। हमारे घर में यदि कोई जबरदस्ती से घुस गया हो तो उसे बाहर घसीट कर ले जाने के लिये हमारे में शरीर बल का ही होना परम इष्ट है। वगैर शरीर बल के वह डाकू खुशी से बाहर नहीं निकलेगा। अतः शरीरबल प्राप्त करना सब से प्रथम ध्येय होना चाहिये। क्योंकि शरीरबल ही सब ध्येयों का मुख्य आधार है। वगैर शरीर सुधार के हम किसी अवस्था में सुखी और स्वतन्त्र नहीं हो सकते और न किसी काम में सिद्धि ही प्राप्त कर सकते हैं। शरीर रोगी होने पर संसार का कोई भी पदार्थ व व्यक्ति हमें कभी सुखी व शान्त नहीं बना सकता। केवल हम ही अपने को एक मात्र सुखी, स्वतंत्र और शान्त बना सकते हैं। अतएव शरीर सुधार हमारा प्रथम लक्ष्य होना चाहिये। क्योंकि यही