भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

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❧ ब्रह्मचर्य ही जीवन ❧

उनका स्वाद्य उन्हें मिलता है। आज कल के ब्राह्मण किसी मरे हुए बड़े सेठ के यहाँ जैसे फॉरन विना बुलाये दौड़े आते हैं; वैसे ही रोग, शोक दुःखादि भी नष्ट-वीर्य-पुरुष के यहाँ फॉरन चले आते हैं। परन्तु आरोग्य, सुख, शान्ति, समृद्धि, आनन्द इनका हाल ऐसा नहीं है, वे बड़े ही मानी हैं। दुराचारी व्यभिचारी पुरुषों से वे कोसों दूर रहते हैं; केवल सदाचारी ब्रह्मचारी पुरुषों के ही यहाँ वे वास करते हैं। ब्रह्मचारी पुरुषों को कोई भी रोग नहीं सता सकता प्लोग कालरा भी उनका कुल्ल नहीं कर सकते। सब कोई दुर्बलों को ही मारते हैं। बलवान को कोई सता नहीं सकता। “द्वैषो दुर्बल घातकः”। वस, यही प्रकृति का कायदा है। अतः हमको अब सब तरह से बलवान ही बनना होगा, क्योंकि बलवान ही राजा है, चाहे वह भले ही निर्धन हो। रोगी पुरुष राजा होने पर भी भिखारी और पूर्ण अभागा समझना चाहिये। “तन्दुरुस्ती दृञ्जार न आमत है।” भोगी पुरुष सदा रोगी ही बना रहता है, वह कभी भी योगी यानी सुखी नहीं हो सकता, वह सदा वियोगी अर्थात् दुःखी ही बना रहता है। व्यभिचारी पुरुष कदापि निरोग और बलवान नहीं हो सकता। एक मात्र वीर्यवान ही बलवान, आरोग्यवान, भक्त और भाग्यवान हो सकता है। वीर्यतट पुरुष सदा रोगी दुःखी, पापी और अभागा ही बना रहता है। उसका उद्धार, फिर से वीर्यधारण किये विना सात जन्म में भी होना असम्भव है।

संसार में तीन बल हैं—एक शरीरबल, दूसरा ज्ञानबल और तीसरा मनोबल। इन तीनों बलों में मनोबल अर्थात् आत्मबल सब से श्रेष्ठ बल है। वगैर आत्मबल के और सब बल वृथा हैं।