भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य व आरोग्य ❁

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६—ब्रह्मचर्य व आरोग्य

“धर्मार्थ काम मोक्षाणां आरोग्यं मूलमुत्तमम् ।

रोगाः तस्याऽपहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च” ॥ १ ॥

एक मात्र आरोग्य ही चारों पुरुषार्थों का सर्वोत्तम मूल है और रोग उन चारों को भी नष्ट कर डालते हैं; यही नहीं किन्तु जीवन को भी अकाल ही में चिन्ता और चिंता पर चढ़ा देते हैं ।

सच है रोगी पुरुष किसी काम का नहीं होता । वह सब के लिये बोझ स्वरूप बन जाता है । रोगी संसार और परमार्थ दोनों में नालायंक बनता रहता है । रोगी मनुष्य के लिये सब संसार शून्य बन जाता है । उसके लिये भोग-विलास की सम्पूर्ण चीजें भी दुःखदायी बन जाती हैं । रोगी पुरुष चाहे राजभवन में रहे चाहे हिमालय जाय—कहीं भी सुखी नहीं हो सकता । उसकी रोगी सूत्र तब ही मिट सकती है कि वह या तो मिट्टी में मिल जाय अथवा प्रकृति के अनुसार पुनः शुद्ध वर्तार करने लग जाय ।

निसर्ग के राज्य में मूलतः प्रत्येक प्राणी निस्सीम निरोगी, परम सुन्दर सब प्रकार से पूर्ण तथा अन्वयंग पैदा होता है; परन्तु स्वयं लोग ही अपने दुष्कृतियों द्वारा अपने दिव्य स्वरूप को, बढ़िया आरोग्य को और सुडौल शरीर को बिगाड़ डालते हैं । “जो जस करड़ सो तस फल चाखा” यह अमिट सिद्धान्त है । सम्पूर्ण विश्व में ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है कि जो हमें हमारी इच्छा के विरुद्ध रोगी या निरोग बन सकता हो । गिद्ध, चील, कन्ने वगैरह उसी स्थान पर जाते हैं, जहाँ पर कोई सड़ा जानवर पड़ा रहता है; उसी तरह रोग, शोक और दुःख उसी शरीर में प्रवेश करते हैं जहाँ पर