ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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ज्ञानी ब्रह्मचारी हुये हैं; जहाँ पर व्यास, वशिष्ठ, वाल्मीक, गौतम, भरद्वाज, अत्रि, पराशर जैसे त्रिकाल ज्ञान के समुद्र हुये हैं, जहाँ पर धर्मराज, शिव, दधीचि, हरिश्चन्द्र, कर्ण और वलि जैसे महान् प्रतापी, सत्यमूर्ति, धर्मावतार हुये हैं; जहाँ पर नीति, न्याय, मर्यादा के पालनेवाले बड़े बड़े शूरवीर रणधुरन्धर, जनक, परिचित, दशरथ, रघु जैसे राजे महाराजे हुये हैं; जहाँ पर विश्वामित्र, भरत, भगीरथ जैसे निस्सीम कठोर व्रत के व्रतधारी महात्मा हुये हैं; जहाँ पर शुक्र, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार जैसे ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मचारी तपस्वी हो गये हैं; जहाँ पर राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और धर्मराज, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेवादि तथा श्रीकृष्ण, वलरामादि जैसे अत्यन्त तेजस्वी-ओजस्वी, आज्ञाकारी, सुपुत्र और सहोदर हो गये हैं; जहाँ पर सीता, सावित्री अनसूया, दमयन्ती, शकुन्तला, रुक्मिणी, द्रौपदी, लोपासुद्रा, मैत्रयी, गांधारी जैसी महान् पतिनिष्ठा और अत्यन्त तेजस्वी सती स्त्रियाँ हो गयी हैं; जहाँ ध्रुव, लव, कुश, महलाद, अभिमन्यु और भरत जैसे महान् तेजस्वी, ओजस्वी और सामर्थ्य-संपन्न सिंहशावक से बालक हुये हैं—उसी वीरप्रसू भारतभूमि में हम उन्हीं की सन्तान आज ऐसी नीच, पतित, दुर्बल, रोगी, मूर्ख, अन्धायु, परतंत्र और पूर्णतया अभारी क्यों हुई हैं ! इसका असली कारण क्या है ? हमको ऐसा नीच परतन्त्र और दुर्भाग्यी बनाने वाले हमारे दुर्धर शत्रु कौन हैं ! !....ठहरिये ! जरा भगवद्वाणी को प्रथम सुन लीजिये; साथ ही तुलसी वचन को भी देखिये
“आत्मैव ह्यारमनो बन्धुरारमैव रिपुरात्मनः ॥”
“काहु न कोउ सुख दुखकर दाता, निजकृत कर्म भोग सब आता”