भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

३-हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम

आजकल समाज में उपर्युक्त अष्ट मैथुनों के अलावा और भी एक मैथुन नवयुवकों में बड़े भीषणरूप से फैल गया है। इस मैथुन से तो बालकों का बड़ा ही भारी संहार हो रहा है; प्लेग और इनफ्लुएन्जा से कहीं बढ़कर यह नया रोग नवयुवकों को जान से मार रहा है। यही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े लिखे-पढ़े हुए लोग भी इस काल के कराल पंजे में 'मोहवश' जा रहे हैं। हा ! यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है। इस महारोग से पिण्ड छुड़ाना पूरे इन्फ्लुएन्जा से भी महा कठिन हो गया है। इस महारोग को "हस्तमैथुन"❁ का रोग कहते हैं। यह रोग बड़ा ही भयानक है ! यह राक्षस मनुष्य को बड़ी क्रूरता से विलकुल निचोड़ डालता है। यह भी एक प्रकार की स्त्री की नवविधा भक्ति ही है। फर्क इतना ही है कि परमात्मा की नवविधा भक्ति से मनुष्य की मुक्ति होती है और स्त्री की किंवा विषय की इस नवविधा भक्ति से मनुष्य को नरक की प्राप्ति होती है।

हस्तमैथुन के कारण जितनी हानियां, उठानी पड़ती हैं यदि केवल उनके नाम ही लिखे जायें तो एक छोटी सी पुस्तिका तैयार हो सकती है। हम यहां पर इस नष्टकारी कुटेव का संक्षेप में ही वर्णन करते हैं। किसी लकड़ी को घुन लगने से जैसे वह विलकुल खोखली पड़ जाती है वैसे ही इस अधम कुटेव से मनुष्य की अवस्था जर्जरभूत होती है।


*पापी मनुष्यों ने धीर्यनाश के धीरों तरीकों निकाले हैं। वे सब अप्राकृतिक व महानिष हैं। अतः वे सब हमने "हस्तमैथुन" में ही समाविष्ट किये हैं।