ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁
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हस्तमैथुन को अङ्गरेजी में ( Masturbation ) मास्टरबेशन कहते हैं। कोई इसे मुष्टिमैथुन, हस्त-क्रिया अथवा आत्म-मैथुन भी कहते हैं। हस्तमैथुन से इन्द्री की सब नसें ढीली पड़ जाती हैं। फल यह होता है कि स्नायुओं के दुर्बल होने से जननेन्द्रिय टेढ़ा, लघु व ढीला पड़ जाता है। मुख की ओर मोटा और जड़ की ओर पतला पड़ जाता है। इन्द्री पर एक नस होती है वह उभर आती है और मुँह के पास वाईं ओर कंटिया की तरह टेढ़ी बन जाती है। यह नितान्त नपुंसकता का चिन्ह है। ऐसे एक बालक को हमने स्वयं देखा है। नस-द्वैर्बल्य से बार बार स्वप्न-दोष होने लगता है। सामान्य कामसंकल्पों से ही अथवा शृङ्गारिक वर्णन, गायन वा दृश्य मात्र से ही ऐसे पतित पुरुष का वीर्य नष्ट होने लगता है। उसका वीर्य पानी की तरह इतना पतला पड़ जाता है कि स्वप्न-दोष के बाद वस्त्र पर उसका चिन्ह तक नहीं दिखाई देता। इन्द्री में वीर्यधारण करने की शक्ति नहीं रह जाती। ऐसा पुरुष स्त्री-समागम के सर्वथा अयोग्य बन जाता है।
शरीर के भीतर “मनोवहा” नामक एक नाड़ी है। इस नाड़ी के साथ शरीर की संपूर्ण नाड़ियों का सम्बन्ध है ! काम-भाव जागृत होते ही ये सब नाड़ियाँ काँप उठती हैं। और शरीर के पैर से सिर तक के सब यंत्र हिल जाते हैं; फिर रक्त का व संपूर्ण शरीर का मथन होकर वीर्य उनसे भिन्न होकर नष्ट होने लगता है जिससे धातु-द्वैर्बल्य, ग्रमेह, स्वप्न-मेह, मधुमेहादि कठिन रोग शरीर में घर कर लेते हैं।
शरीर के खून में एक सफ़ेद ( White corpuscle ) और दूसरे लाल ( Red corpuscle ) कीट होते हैं। सफ़ेद कीटों