ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 199 में से
संदर्भ में पढ़ें१० ]
❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
में रोगों के कीटों से लड़ने की शक्ति होती है। वीर्य जितना ही पुष्ट व अधिक होता है उतने ही ये शुभ्र कोट महान् वलवान होते हैं और विष को भी पचा डालने की शक्ति रखते हैं। परन्तु ज्योंही वीर्य क्षीण होता है त्योंही ये कीट भी दुर्बल बनकर हैजा प्लेग, मलेरिया के कीटाणुओं से दब जाते हैं और फिर मनुष्य भी काल के गाल में प्रवेश करता है। ये वीर्यनाश के ही दारुण फल हैं।
हस्तमैथुन से जो वीर्यनाश किया जाता है उससे शरीर और दिमाग के समस्त स्नायुओं पर बड़ा भारी धक्का पहुँचता है। जिससे पश्चाघात, ग्रन्थिवात, सन्धिवात, अपस्मार-मृगी और पागलपन आदि भीपणरोगों की उत्पत्ति होती है। व्यभिचार तो सर्वथा निन्द्य है ही परन्तु उससे भी महानिन्द्य यह हस्तमैथुन का कर्म है। हस्तमैथुन द्वारा वीर्य के निकलने से कलेजे में विशेष धक्का लगता है। जिससे क्षय, खाँसी, श्वास; यक्ष्मा और “हार्ट डिजीज़” नामक महाभयानक हृदय-रोग हो जाते हैं। हृद्रोग से ऐसे अभागे मनुष्य की कौन से समय में मृत्यु होगी इसका कुछ भी निश्चय नहीं होता। अकाल ही में वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। मस्तिष्क पर तो विजली का सा धक्का लगता है। हस्तमैथुन से सिर फौरन हल्का और खाली पड़ जाता है। स्मृति (याददास्त) सु-बुद्धि, प्रतिभा सभी चौपट हो जाते हैं और अन्त में ऐसा नष्ट-वीर्य पुरुष पागल सा बन जाता है। पागल-खानों में सौ में ९५ आदमी व्यभिचार और हस्तमैथुन के ही कारण पागल बने होते हैं। यही हालत अपनी स्त्री से अति रति करने वालों की भी हुस्सा करती है।
- टारेन्टों के डाक्टर वर्कमन कहते हैं “सैकड़ों पागलखानों की जाँच करने पर हमें यही ज्ञात हुस्सा कि जिनको हम आप नीतिभ्रष्ट