ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁
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अशिचित व मूर्ख समझते हैं उनमें नहीं; किन्तु धर्म से व स्वच्छता से रहने वाले शिचित लोगों में ही यह हस्तमैथुन का रोग विशेष-रूप से फैला हुआ है।” खेतों में शारीरिक परिश्रम करने वालों मूर्खों में नहीं किन्तु शहरों के पुस्तक-कीट बने हुए नवयुवकों और आदमियों में ही यह घृणित रोग विशेष फैला हुआ है। माता-पिता इस भीतरी कारण को नहीं जानते। वे समझते हैं कि परिश्रम की अधिकता से ही बालकों की ऐसी दुर्दशा हुई है ! मस्तिष्क कमजोर होते ही आँखों की ज्योति और कान व दाँत की शक्ति भी कमजोर हो जाती है। बाल झड़ने और पकने लगते हैं। राजा के घायल होते ही जैसे संपूर्ण सेना एक वारगी घबड़ा जाती है उसी प्रकार वीर्यरूपी राजा को आघात पहुँचते ही शरीर की इन्द्रियरूपी सेना एक वारगी अस्वस्थ व कमजोर हो जाती है। आँख, कान, नाक, जिह्वा, वाणी, हाथ, पैर, त्वचा, आँतें और मलमूत्रेन्द्रिय अपना काम करने में असमर्थ हो जाती हैं फिर ऐसे पुरुष का बहुत जल्द नाश होता है।
हस्तमैथुन से संपूर्ण शरीर पीला, ढीला, फीका, दुर्बल व रोगी बन जाता है। मुख-कान्ति हीन व पीली पड़ जाती है। ऐसा पुरुष जीवित रहते हुये भी मुर्दा होता है ! हाय ! जिस विषयानन्द को कामी लोग ब्रह्मानन्द से भी बढ़कर समझते हैं, वह विषयानन्द भी ऐसे पतित पुरुष ज्यादा दिन तक नहीं भोग सकते। इन्द्रिय दुर्बलता के और अन्यान्य रोगों के कारण वे गाहैस्थ्य सुख भी नहीं भोग सकते। उनकी सन्तानोत्पादन शक्ति नष्ट हो जाती है। जिससे इनकी स्त्रियाँ-बन्ध्या बनी रहती हैं। अथवा सन्तान हुई तो कन्या ही कन्या होती हैं। ऐसे लोग काम के मारे वैकाम बन जाते हैं।