ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❖ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❖
सन्ततिमुख से वे हाथ धो बैठते हैं। उनकी स्त्रियों को कभी सन्तोष नहीं होता है ! फिर वे व्यभिचार करने लगती हैं। स्त्रियों के विगड़ने से सन्तान भी दुःसाध्य होती है व अधर्म की वृद्धि होती है। अधर्म के फैलते ही घर में व देश में दारिद्र्य, अकाल व अशान्ति आदि फैलते हैं। फिर सुख की आशा कहाँ ? अन्त में सब कुल नरकगाभी होता है। ( गीता अ० १ ला श्लोक ४१ से ४४ देखो ) इस महा पाप के मूल कारण व भागी दुराचारी पुरुष ही होते हैं।
हाय ! यह बड़ा ही अधर्म और दुष्ट कर्म है। जिस अभागे को इसके करने का एक चार भी दुर्भाग्य प्राप्त हुआ तो धीरे धीरे यह “शैतान” हाथ धोकर उसके पीछे पड़ जाता है, वहाँ तक कि प्राण बचना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे पुरुष इस महानिन्द कुट्टेव के पूर्ण गुलाम बन जाते हैं। दुर्बल चित्त के कारण इच्छा करने पर भी वे संयम नहीं कर सकते। हजारों प्रतिज्ञायें करने पर भी एक भी प्रतिज्ञा पूरी नहीं होने पाती। विषयों के सामने आते ही सभी प्रतिज्ञायें ताक पर धरी रह जाती हैं। इस प्रकार वीर्य को नष्ट करने से मनुष्य का मनुष्यत्व लोप हो जाता है। और उसका जीवन उसी को भारस्वरूप मालूम होने लगता है। आबोधवा का परिवर्तन थोड़ा भी सहन नहीं होता। हर समय सदी गर्मी मालूम होने लगती है, जुकाम, सिर-दर्द और छाती में पीड़ा होने लगता है। ऋतुओं के बदलते ही उसके स्वास्थ्य में भी फर्क होता है और अन्यान्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं। देश में जब कभी बीमारी फैलती है तब सबसे पहले ऐसा ही पुरुष बीमार पड़ता है और अक्सर वही काल का शिकार बनता है।