ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ हस्तमैथुन और उसके दुष्परिणाम ❁
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हा ! ऋषि-सन्तानों के दिव्यनेत्र व ज्ञाननेत्र सब नष्ट हो गये हैं और उनको अब उपनेत्र के बिना देखना भी मुश्किल हो गया है। अज्ञान की घनघोर घटा भारत-आकाश को चारों ओर से आन्धल कर रही है। आर्य-सन्तान आज पूर्णतया तेजोहीन व गुलाम बन कर भारत माता का सुख कलंकित कर रहे हैं ! हा ! शोक !! शोक !!! शोक !!!
वस, अब हम इससे अधिक वर्णन करना नहीं चाहते। केवल वीर्यभ्रष्टता के प्रमुख चिन्ह ही कह कर इस विषय को समाप्त करते हैं, जिससे कि हम लोग पतित बालक, बालिका, व स्त्री-पुरुष को फौरन पहचान सकें।
वीर्यनाश के मुख्य लक्षण।
(१) काम पीड़ित वीर्यधन ( वीर्य को नष्ट करने वाला ) बालक बड़े आदमियों की तरफ आँख से आँख मिला कर नहीं देख सकता। किसी अपराधी की तरह शर्मिन्दा होकर नीचे देखता है अथवा इधर उधर मुंह छिपाना चाहता है।
(२) बहुत से चालाक या धूर्त लड़के भूठे ही छाती निकाल कर समाजमें इतस्ततः ऐंठते हुए अकड़ कर घूमा करते हैं। वे ज़रूरत से अधिक ठीठ बन जाते हैं; हेतु यह कि ऐसा करने से उनके दुर्गुण छिप जायेंगे और लोगों की दृष्टि में वे निर्दोष जचेंगे।
(३) उसका आनन्दमय व हँसमुख चेहरा दुःखी व उदास बन जाता है। सूरत रौनी बन जाती है। प्रसन्न-स्वभाव नष्ट होकर चिड़चिड़ा, क्रोधी व रुच (रुखा) बन जाता है। चेहरा फीका, पीला व मुर्दे की तरह निस्तेज बन जाता है।
(४) गालों पर की पहले की वह गुलाबी छटा नष्ट होकर गालों