भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

पर भाई पड़ने (काले दाग पड़ना) लगती है। यह अत्यन्त वीर्यनाश का निश्चित लक्षण है।

(५) आँखें व गाल अन्दर धँस जाते हैं और गाल की हड्डियाँ खुल जाती हैं।

(६) बाल पकने व भड़ने लगते हैं। मूछें पीली व सुर्ख यानी लाल बन जाती हैं। चारह वर्ष के उपरान्त बाल का सफेद होना वीर्यनाश का स्पष्ट लक्षण है।

(७) कोई भी रोग न रहते हुए अकाल ही में वृद्ध पुरुष की तरह जर्जर, दुर्बल व ढीले बनना; किसी अच्छे काम में दिल न लगना व नाताक्रुत बनना तथा थोड़े ही परिश्रम से व दौड़ने से हँफने लगना और मृतपिण्ड की तरह उत्साहहीन बनना; दैनिक काम करना भी अच्छा न लगना; सामान्य से सामान्य काम भी कठिन जान पड़ना।

(८) चित्त में कुचिन्ताओं का बढ़ना। थोड़े ही डर से छाती में वेहद थडकन आना तथा भयभीत हो जाना। थोड़ा सा भी दुःख पहाड़ सा मालूम होना।

(९) बार बार भूठी ही अस्वाभाविक भूख लगना अथवा भूख का मन्द पड़ जाना, यह भी वीर्यनाश का प्रमुख चिन्ह है। अपच और मलबद्धता (कञ्जियत) इसका निश्चित परिणाम है। चरपर मसालेदार पदार्थ खाने में अधिक रुचि रखना।

(१०) नींद का न आना; यदि आई तो ऐसी आना जैसी कुम्भकर्ण की निद्रा जैसी। उठते समय महा आलस्य व निरुत्साह मालूम करना और आँखों का भारी पड़ना।