ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
भी एक-दो लक्षण पुत्र-पुत्री और शिष्य-मित्रोंमें दिखाई दें तो फौरन उन के सामने पाप के परिणाम का भीषण चित्र तथा ब्रह्मचर्य की श्रेष्ठमहिमा स्पष्ट शब्दों में रखनी चाहिए । इसमें लज्जा संकोच करना तथा अपमान समझना मानो अपनी सन्तान का पूर्ण नाश ही करना है । “शरीरं व्याधि मन्दिरम् ” तब ही बनता है जब कि मनुष्य ब्रह्मचर्य के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करता है । अतः उन्हें उन नियमों का अवश्य ज्ञान करा देना चाहिये । माता, पिता व गुरु ब्रह्मचर्य का पूर्ण स्पष्ट वर्णन करने में लजाते हैं ! परन्तु यह उनकी भारी भूल एवं मूर्खता है । अपने पर वीती हुई दुर्घटनाओं को, जिनके दुष्परिणाम माता-पिता तथा गुरुजनों को आज भी उनकी मर्जी के विरुद्ध भोगने पड़ रहे हैं, लड़कों से साफ साफ कहें और उनसे बचे रहने के लिये अपने अनुभूत इलाज को स्पष्ट बतलायें अथवा यह जीवन पथप्रदीप ग्रन्थ अपने प्रिय बालकों, शिष्यों अथवा मित्रों के हाथ में रख दें, जिससे उनका कर्तव्यमार्ग उन्हें साफ दिखाई दे ।
कई लोग यह समझते हैं कि यदि बालकों के सामने ब्रह्मचर्य की रक्षा के हेतु हस्तमैथुन शिशुमैथुनादि महानिन्द्य वुराइयों का वर्णन करे, तो वे यदि न भी जानते होंगे तो इन दुर्गुणों को जान लेंगे परन्तु यह धारणा विलकुल बृथा व नाशकारी है । यदि आप न कहेंगे तो बालक कुसंगों में पड़ कर दूसरों से अवश्य ही उपर्युक्त दुर्गुण सीख लेंगे । परन्तु वुराइयों का तीव्र निषेध व ब्रह्मचर्य की उज्ज्वल महिमा आप वर्णन करेंगे तो आपके बालक अवश्य ही सदाचारी व ब्रह्मचारी बनेंगे ऐसा पूर्ण विश्वास रखेंगे । गन्दगी या गडदे को ढाकने के वनिस्वत उससे बचे रहने का ज्ञान करा