ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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(२८) मेहदण्ड का मुक जाना; फिर हर वृक्ष मुक कर बैठना ।
(२९) वृषण की बृद्धि होना तथा उनका विशेष लटक जाना ।
(३०) आवाज की कोमलता नष्ट होकर आवाज मोटा, रुखा व अप्रिय बन जाना ।
(३१) छाती का दुर्भंग हो जाना अर्थात् छाती पर का अंतर गहरा और विस्तृत बन जाना । और छाती की हड्डियाँ दीखना ।
(३२) नेत्ररूपी चन्द्र-सूर्य को ग्रहण लगना । नाक के कोने में प्रथम कालिमा छा जाती है, फिर बढ़ते बढ़ते आँखों के चतुर्दिक ग्रहण लग जाता है अर्थात् चारों ओर से नेत्र काले पड़ जाते हैं । यह अत्यन्त वीर्यनाश का बड़ा भयानक और भीषण चिन्ह है ।
(३३) किसी बात में कामयाबी न होना तथा सर्वत्र निन्दित व अपमानित बनना यह वीर्यनाश की पूरी निशानी है । सन्तति-सम्पत्ति का धीरे धीरे नाश होना, अधर्म, व्यभिचार व पाप का बढ़ता; आयु का घट जाना; वेदशास्त्राज्ञाओं को कुछ भी न मानना और अपनी ही मनमानी करना अर्थात् “विनाश काले विपरीत बुद्धिः” इस न्याय से सब उलटी ही बातें करना यह गुलामी के खास चिन्ह हैं । सम्पूर्ण अपयश, दुःख व गुलामी का कारण एक मात्र वीर्य का नाश ही है ।
(३४) अन्त में कभी कभी दुःख और पश्चाताप के मारे आत्महत्या करने का भी विचार करना । इति प्रमुख विह्वानि ।
४-माता-पिताओं का कर्तव्य
प्रत्येक माता, पिता, गुरु, वन्धु तथा मित्र का सब से प्रथम कर्तव्य अब यही होना चाहिये कि यदि उपर्युक्त लक्षणों में कोई
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