ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
पृष्ठ 33, कुल 199 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ ]
❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
(२०) किसी समय ऊपर उठते समय एकाएक दृष्टि के सामने अन्धेरा छा जाना तथा मुर्छा आने से नीचे गिर पड़ना ।
(२१) मस्तिष्क का विलकुल हलका व खाली पड़ना । स्मरण शक्ति का हास होना । देखे हुए स्वप्न का याद न आना । रक्खी हुई वस्तु का स्मरण न होना और कण्ठ की हुई कविता या पाठ भी भूल जाना और मानसिक दुर्बलता का बढ़ जाना ।
(२२) आबो हवा का परिवर्तन न सहा जाना ।
(२३) चित्त का अत्यन्त चंचल, दुर्बल, कामी व पापी बनना और कोई भी प्रतिज्ञा पूरी न कर सकना तथा सब काम अधूरे ही कर के छोड़ देना । एक भी अच्छा काम पूर्ण न करना, परं कुकर्म प्रयत्न पूर्वक पूरा करना । गिरगिट की तरह सदा विचार व निश्चय बदलते रहना और सदा मन मलीन व नाशक बने रहना ।
(२४) दिमाग में गर्मी छा जाना । नेत्रों में जलन उत्पन्न होना व नेत्रों से पानी बहने लगना ।
(२५) क्षण ही में रुष्ट व क्षण ही में तुष्ट होना ।
(२६) माथे में, कमर में, मेरुदण्ड में और छाती में बार बार दर्द उत्पन्न होना ।
(२७) दाँत के मसूड़े फूलना । मुख से महान् दुर्गन्धि का आना तथा शरीर से भी ❁ बदबू निकलना । वीर्यवान् के शरीर से सुगन्धि निकलती है । (अतः दाँत को विलकुल साफ रखना चाहिये ।)
*दुर्गन्धो भोगिनो देहे जायते धिन्दुसंक्षयात् ।
श्री शिवदास वामन