भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

१८ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

भी एक-दो लक्षण पुत्र-पुत्री और शिष्य-मित्रोंमें दिखाई दें तो फौरन उन के सामने पाप के परिणाम का भीषण चित्र तथा ब्रह्मचर्य की श्रेष्ठमहिमा स्पष्ट शब्दों में रखनी चाहिए । इसमें लज्जा संकोच करना तथा अपमान समझना मानो अपनी सन्तान का पूर्ण नाश ही करना है । “शरीरं व्याधि मन्दिरम् ” तब ही बनता है जब कि मनुष्य ब्रह्मचर्य के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करता है । अतः उन्हें उन नियमों का अवश्य ज्ञान करा देना चाहिये । माता, पिता व गुरु ब्रह्मचर्य का पूर्ण स्पष्ट वर्णन करने में लजाते हैं ! परन्तु यह उनकी भारी भूल एवं मूर्खता है । अपने पर वीती हुई दुर्घटनाओं को, जिनके दुष्परिणाम माता-पिता तथा गुरुजनों को आज भी उनकी मर्जी के विरुद्ध भोगने पड़ रहे हैं, लड़कों से साफ साफ कहें और उनसे बचे रहने के लिये अपने अनुभूत इलाज को स्पष्ट बतलायें अथवा यह जीवन पथप्रदीप ग्रन्थ अपने प्रिय बालकों, शिष्यों अथवा मित्रों के हाथ में रख दें, जिससे उनका कर्तव्यमार्ग उन्हें साफ दिखाई दे ।

कई लोग यह समझते हैं कि यदि बालकों के सामने ब्रह्मचर्य की रक्षा के हेतु हस्तमैथुन शिशुमैथुनादि महानिन्द्य वुराइयों का वर्णन करे, तो वे यदि न भी जानते होंगे तो इन दुर्गुणों को जान लेंगे परन्तु यह धारणा विलकुल बृथा व नाशकारी है । यदि आप न कहेंगे तो बालक कुसंगों में पड़ कर दूसरों से अवश्य ही उपर्युक्त दुर्गुण सीख लेंगे । परन्तु वुराइयों का तीव्र निषेध व ब्रह्मचर्य की उज्ज्वल महिमा आप वर्णन करेंगे तो आपके बालक अवश्य ही सदाचारी व ब्रह्मचारी बनेंगे ऐसा पूर्ण विश्वास रखेंगे । गन्दगी या गडदे को ढाकने के वनिस्वत उससे बचे रहने का ज्ञान करा

❁ वैद्य व डाक्टर ❁

[ १९ ]

देना ही बुद्धिमान्नी व सुरक्षितता है और यही माता-पिता तथा गुरुजनों का पवित्र कर्तव्य है। यदि गुरुजन अच्छे अच्छे कामों द्वारा अच्छे ढंग से बालक-बालिकाओं को ब्रह्मचर्य की केवल पन्द्रह मिनट स्कूलों में या घर ही पर बढ़िया शिक्षा दें, तो क्या ही अच्छा हो? हम पूर्ण विश्वास से कह सकते हैं कि भारत का इससे अति शीघ्र उद्धार हो सकता है। अतः माता-पिताओं ! सावधान !!

५—वैद्य व डाक्टर

माता-पिता तथा गुरुजनों की लापरवाही के कारण कई अच्छे बालक कुसंग में पड़कर विगड़ जाते हैं। वीर्य-नाश व व्यभिचार के कारण वे अनेकानेक दारुण रोगों से आक्रान्त हो जाते हैं; फिर वे वैद्य व डाक्टरों के मकान व दूकान छिपे छिपे दूँढ़ने लगते हैं। कोई मदनमंजरी पिल्स, धातुपुष्टि की गोलियाँ, वीर्यगुटिका, नपुंसकारिघृत, कोई जड़ी, बूटी, लेह, पाक चूर्ण आदि दूर दूर से मँगवाते हैं; और बेचारे लाभ की जगह, और भी तन से, मन से व धन से वर्वाद हो जाते हैं; इसका कारण यह है कि जितनी धातु-पौष्टिक औषधियाँ होती हैं वे सब कामोत्तेजक होती हैं; उनके सेवन से शरीर में यदि कुछ ताकत भी दीख पड़ती हो तो यह केवल मनुष्य की भावना तथा उस औषधि के साथ खाने हुये दूध मलाई आदि का प्रभाव है। संसार में ऐसा कोई भी वैद्य समर्थ नहीं है कि जो द्वादर्पन द्वारा वीर्यहीन को वीर्यवान् अर्थात् ब्रह्मचारी बना सकता हो। यदि कोई ऐसा कहें

२० ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

तो उसकी धृष्टता एवं मूर्खता है। एक मात्र शुद्ध मन ही मनुष्य को ब्रह्मचारी पद वीर्य धारण करने के लिये समर्थ बना सकता है। दवा-दर्पण कदापि नहीं इनसे तो वीर्य का औरभी नाश होता है।

आजकल जिसे देखो वही वैद्य बन बैठा है। 'बूढ़ा भी जवान हो गया' 'मुर्दा भी ज़िन्दा हो गया' 'अजब ताकत की दवा' ऐसे ऐसे भूठे विज्ञापन, का मोहजाल फैलाकर वेश्याओं की तरह बाल-बालिकाओं को तन से, मन से, धन से, व प्राण से ये वैद्य बरबाद कर रहे हैं। प्यारे भाइयों, ऐसे स्वार्थान्व वैद्यों से बचे रहो। सुयोग्य वैद्यों तथा माता पिता व गुरुजनों के सामने अपने रोग का स्पष्ट वर्णन करके उनसे उचित सलाह लो। बहुत सी औषधियाँ अन्य रोगों के लिये भी दिव्य गुणकारी होती हैं; परन्तु एक मात्र विशुद्ध मन सम्पूर्ण संसार में वीर्य-रक्षा के लिये दिव्यौषधि है। अन्य सब उपाय वृथा व आनुपंगिक हैं।

जब रोगियों के बारे में वैद्यों का कुछ भी वश नहीं चलता तो अन्त में जल-त्रायु परिवर्तन के लिए ही उन्हें सलाह दी जाती है; परन्तु उसके पहले वे रोगियों को खूब लूट लेते हैं। सचमुच शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध व पवित्र भूमि, विपुल प्रकाश व विपुल अवकाश वस ये ही इस लोक के पश्चाभूत हैं। इसी का सेवन करने से हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि इतने दीर्घायु, आरोग्य-संपन्न ज्ञानी पवित्र-मानस व सामर्थ्य-सम्पन्न होते थे। यदि हम भी इसी "पंचामृत" का यथेष्ट सेवन "रोज नियम पूर्वक" किया करेंगे तो हम भी उनके समान निःसंदेह श्रेष्ठ बन जायेंगे।

❁ ब्रह्मचर्य व आरोग्य ❁

[ २१ ]

६—ब्रह्मचर्य व आरोग्य

“धर्मार्थ काम मोक्षाणां आरोग्यं मूलमुत्तमम् ।

रोगाः तस्याऽपहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च” ॥ १ ॥

एक मात्र आरोग्य ही चारों पुरुषार्थों का सर्वोत्तम मूल है और रोग उन चारों को भी नष्ट कर डालते हैं; यही नहीं किन्तु जीवन को भी अकाल ही में चिन्ता और चिंता पर चढ़ा देते हैं ।

सच है रोगी पुरुष किसी काम का नहीं होता । वह सब के लिये बोझ स्वरूप बन जाता है । रोगी संसार और परमार्थ दोनों में नालायंक बनता रहता है । रोगी मनुष्य के लिये सब संसार शून्य बन जाता है । उसके लिये भोग-विलास की सम्पूर्ण चीजें भी दुःखदायी बन जाती हैं । रोगी पुरुष चाहे राजभवन में रहे चाहे हिमालय जाय—कहीं भी सुखी नहीं हो सकता । उसकी रोगी सूत्र तब ही मिट सकती है कि वह या तो मिट्टी में मिल जाय अथवा प्रकृति के अनुसार पुनः शुद्ध वर्तार करने लग जाय ।

निसर्ग के राज्य में मूलतः प्रत्येक प्राणी निस्सीम निरोगी, परम सुन्दर सब प्रकार से पूर्ण तथा अन्वयंग पैदा होता है; परन्तु स्वयं लोग ही अपने दुष्कृतियों द्वारा अपने दिव्य स्वरूप को, बढ़िया आरोग्य को और सुडौल शरीर को बिगाड़ डालते हैं । “जो जस करड़ सो तस फल चाखा” यह अमिट सिद्धान्त है । सम्पूर्ण विश्व में ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है कि जो हमें हमारी इच्छा के विरुद्ध रोगी या निरोग बन सकता हो । गिद्ध, चील, कन्ने वगैरह उसी स्थान पर जाते हैं, जहाँ पर कोई सड़ा जानवर पड़ा रहता है; उसी तरह रोग, शोक और दुःख उसी शरीर में प्रवेश करते हैं जहाँ पर

२२ ]

❧ ब्रह्मचर्य ही जीवन ❧

उनका स्वाद्य उन्हें मिलता है। आज कल के ब्राह्मण किसी मरे हुए बड़े सेठ के यहाँ जैसे फॉरन विना बुलाये दौड़े आते हैं; वैसे ही रोग, शोक दुःखादि भी नष्ट-वीर्य-पुरुष के यहाँ फॉरन चले आते हैं। परन्तु आरोग्य, सुख, शान्ति, समृद्धि, आनन्द इनका हाल ऐसा नहीं है, वे बड़े ही मानी हैं। दुराचारी व्यभिचारी पुरुषों से वे कोसों दूर रहते हैं; केवल सदाचारी ब्रह्मचारी पुरुषों के ही यहाँ वे वास करते हैं। ब्रह्मचारी पुरुषों को कोई भी रोग नहीं सता सकता प्लोग कालरा भी उनका कुल्ल नहीं कर सकते। सब कोई दुर्बलों को ही मारते हैं। बलवान को कोई सता नहीं सकता। “द्वैषो दुर्बल घातकः”। वस, यही प्रकृति का कायदा है। अतः हमको अब सब तरह से बलवान ही बनना होगा, क्योंकि बलवान ही राजा है, चाहे वह भले ही निर्धन हो। रोगी पुरुष राजा होने पर भी भिखारी और पूर्ण अभागा समझना चाहिये। “तन्दुरुस्ती दृञ्जार न आमत है।” भोगी पुरुष सदा रोगी ही बना रहता है, वह कभी भी योगी यानी सुखी नहीं हो सकता, वह सदा वियोगी अर्थात् दुःखी ही बना रहता है। व्यभिचारी पुरुष कदापि निरोग और बलवान नहीं हो सकता। एक मात्र वीर्यवान ही बलवान, आरोग्यवान, भक्त और भाग्यवान हो सकता है। वीर्यतट पुरुष सदा रोगी दुःखी, पापी और अभागा ही बना रहता है। उसका उद्धार, फिर से वीर्यधारण किये विना सात जन्म में भी होना असम्भव है।

संसार में तीन बल हैं—एक शरीरबल, दूसरा ज्ञानबल और तीसरा मनोबल। इन तीनों बलों में मनोबल अर्थात् आत्मबल सब से श्रेष्ठ बल है। वगैर आत्मबल के और सब बल वृथा हैं।

❁ ब्रह्मचर्य व आरोग्य ❁

[ २३ ]

वाहुबल, सैन्यबल, द्रव्यबल, नीतिबल, मतिबल, धृतिबल, निश्चयबल, चारित्र्यबल, धर्मबल, ब्रह्मबल, वगैरह जितने बल संसार में मौजूद हैं, सब इन्हीं तीनों बलों के अन्तर्गत हैं। इनमें सबसे पहिली सीढ़ी 'शरीर-बल' की है वगैर निरोग शरीर के ज्ञानबल और आत्मबल प्राप्त नहीं हो सकते। शरीरबल ही हमारे सम्पूर्ण बलों का एक मात्र मूलधार है। अतएव हमें व्यायाम और ब्रह्मचर्य द्वारा सब से प्रथम शरीर सुधार अवश्य कर लेना चाहिये।

आज हमें भारत के उत्थान के लिये आत्मबल अर्थात् चरित्र-बल की तो मुख्य आवश्यकता है ही; परन्तु उसके साथ ही साथ शारीरिक बल और ज्ञानबल की भी अत्यन्त अनिवार्यरूप से आवश्यकता है। शरीर बल न होगा तो हम संसार-संग्राम में विजय प्राप्त नहीं कर सकेंगे। दुर्बलता के कारण हम दूसरों के तथा काम क्रोध रोगादि वैरियों के सदा दास ही बने रहेंगे। हमारे घर में यदि कोई जबरदस्ती से घुस गया हो तो उसे बाहर घसीट कर ले जाने के लिये हमारे में शरीर बल का ही होना परम इष्ट है। वगैर शरीर बल के वह डाकू खुशी से बाहर नहीं निकलेगा। अतः शरीरबल प्राप्त करना सब से प्रथम ध्येय होना चाहिये। क्योंकि शरीरबल ही सब ध्येयों का मुख्य आधार है। वगैर शरीर सुधार के हम किसी अवस्था में सुखी और स्वतन्त्र नहीं हो सकते और न किसी काम में सिद्धि ही प्राप्त कर सकते हैं। शरीर रोगी होने पर संसार का कोई भी पदार्थ व व्यक्ति हमें कभी सुखी व शान्त नहीं बना सकता। केवल हम ही अपने को एक मात्र सुखी, स्वतंत्र और शान्त बना सकते हैं। अतएव शरीर सुधार हमारा प्रथम लक्ष्य होना चाहिये। क्योंकि यही

२४ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

चारों पुरुषार्थों का मुख्य मूल है; और इसी में हमारी सुक्ति किंवा स्वतन्त्रता भरी हुई है।

“Sound Mind in a Sound Body” यानी “शरीर सुखी और पुष्ट है तो आत्मा भी सुखी और पुष्ट है और शरीर दुखी और दुर्बल है तो आत्मा भी दुखी और दुर्बल है,” यही प्रकृति-शास्त्र का नियम है, शरीर निरोग होने पर हमारी आत्मा भी अत्यन्त निर्मल, बली और सामर्थ्य-संपन्न बन जाती है। रोगी शरीर में आत्मा की उन्नति का होना कठिन है। अतएव प्रकृति के नियमानुसार चलकर सदाचरण द्वारा ब्रह्मचारी बन, अपना शरीर सुधार लेना हमारा सब से प्रथम और श्रेष्ठ कर्तव्य है।

हमारा केवल यही एक मात्र शरीर नहीं है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण, ऐसे हमारे चार शरीर हैं और इनके अतिरिक्त हमारे इस शरीररूपी साम्राज्य में असंख्य शरीरधारी कीटाणुओं की सेना सर्वत्र भरी हुई है, जो कि हमारी रात-दिन रक्षा कर रही है। इन सब का अधिष्ठाता आत्मा उनका राजा है। विजय उसी राजा की होती है जिसकी सेना बलवान और प्रचण्ड है। ठीक यही हालत हमारे शरीररूपी सेना की और आत्मारूपी राजा की समझिये।

७-ब्रह्मचर्य के विषय में प्रमाद

आज हिन्दू जाति इतनी पतित क्यों हुई है ! वह इतनी रोगी, दुर्बल, निरुत्साही, मूर्ख और अल्पायु क्यों हुई है। जिस भारतवर्ष में भीष्म पितामह और हनुमान जैसे शरवीर, गंभीर, धीर और

❁ ब्रह्मचर्य के विषय में प्रसाद ❁

[ २५ ]

ज्ञानी ब्रह्मचारी हुये हैं; जहाँ पर व्यास, वशिष्ठ, वाल्मीक, गौतम, भरद्वाज, अत्रि, पराशर जैसे त्रिकाल ज्ञान के समुद्र हुये हैं, जहाँ पर धर्मराज, शिव, दधीचि, हरिश्चन्द्र, कर्ण और वलि जैसे महान् प्रतापी, सत्यमूर्ति, धर्मावतार हुये हैं; जहाँ पर नीति, न्याय, मर्यादा के पालनेवाले बड़े बड़े शूरवीर रणधुरन्धर, जनक, परिचित, दशरथ, रघु जैसे राजे महाराजे हुये हैं; जहाँ पर विश्वामित्र, भरत, भगीरथ जैसे निस्सीम कठोर व्रत के व्रतधारी महात्मा हुये हैं; जहाँ पर शुक्र, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार जैसे ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मचारी तपस्वी हो गये हैं; जहाँ पर राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और धर्मराज, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेवादि तथा श्रीकृष्ण, वलरामादि जैसे अत्यन्त तेजस्वी-ओजस्वी, आज्ञाकारी, सुपुत्र और सहोदर हो गये हैं; जहाँ पर सीता, सावित्री अनसूया, दमयन्ती, शकुन्तला, रुक्मिणी, द्रौपदी, लोपासुद्रा, मैत्रयी, गांधारी जैसी महान् पतिनिष्ठा और अत्यन्त तेजस्वी सती स्त्रियाँ हो गयी हैं; जहाँ ध्रुव, लव, कुश, महलाद, अभिमन्यु और भरत जैसे महान् तेजस्वी, ओजस्वी और सामर्थ्य-संपन्न सिंहशावक से बालक हुये हैं—उसी वीरप्रसू भारतभूमि में हम उन्हीं की सन्तान आज ऐसी नीच, पतित, दुर्बल, रोगी, मूर्ख, अन्धायु, परतंत्र और पूर्णतया अभारी क्यों हुई हैं ! इसका असली कारण क्या है ? हमको ऐसा नीच परतन्त्र और दुर्भाग्यी बनाने वाले हमारे दुर्धर शत्रु कौन हैं ! !....ठहरिये ! जरा भगवद्वाणी को प्रथम सुन लीजिये; साथ ही तुलसी वचन को भी देखिये

“आत्मैव ह्यारमनो बन्धुरारमैव रिपुरात्मनः ॥”

“काहु न कोउ सुख दुखकर दाता, निजकृत कर्म भोग सब आता”

२६ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

क्या हमारे शत्रु हम ही हैं और हमारे मित्र भी हम ही हैं ? क्या हमारे ही कृत कर्मों से हमें ऐसी नीच दशा प्राप्त हुई है ? हाँ, भगवद्वाणी तथा संतवाणी हमें यही बतला रही है ! “तुम ही अपने मित्र हो तथा तुम ही अपने शत्रु भी हो, अपने पतन के कारण केवल तुम्हें ही हो ।”

सत्य है ! नीति न्याय मर्यादा का उल्लंघन करने ही से अर्थात् अधर्म और अन्याय बढ़ने ही से आज हमारी ऐसी पतित हालत हुई है; जैसे हम अपने को कुकर्मों द्वारा पतित बना सकते हैं वैसे ही सुकर्मों द्वारा अपना उद्धार भी कर सकते हैं । उन्नति के लिये अब हमें धर्मका आचरण अवश्य ही अति शीघ्र शुरु करना होगा ! श्री गीतादेवी के सच्चे अध्ययन की आज हमें नितान्त आवश्यकता है । आज हमें सच्चे कर्मवीरों की बड़ी ही जरूरत है । वीर्यभ्रष्ट कच्चे कर्मवीर बड़े ही घातक होते हैं; वीच ही में किसी डर के कारण अपनै कर्तव्य को छोड़ भागने वाले पुरुष बड़े कायर और नामर्द होते हैं । “काम मर्दों का नहीं जो कि अधूरा करना, जो बात ज्यों से निकाले उसे पूरा करना ।” वस ऐसे ही मर्द पुरुष की आज भारत को जरूरत है । नामर्द और व्यभिचारी पुरुष का अब यहाँ कुछ भी काम नहीं है । क्योंकि ऐसे लोग देश के घोर शत्रु होते हैं । वीर्यनाश के कारण आज तक बहुत कुछ नाश हो चुका है । अब हमें अपने पूर्वजों का अनुकरण अति शीघ्र करना होगा और दुराचार को छोड़ पूर्ण सदाचारी और ब्रह्मचारी बनना होगा । ‘हमारे बाबा ऐसे थे और वैसे थे, ऐसा कोरा अभिमान और कोरी बातें हमें अब साफ छोड़ देनी होगी । उनकी जैसी प्रत्यक्ष करनी ही करके हमें अब दिखलाना

❁ ब्रह्मचर्य व आश्रम चतुष्टय ❁

[ २७ ]

होगा । हमें अपने पूर्वजों की तरह प्रत्यक्ष वीर्यवान और सामर्थ्यवान बनना होगा । आज भी हम भीमाजुन जैसे बली और धनुर्धारी अर्जुन बन सकते हैं प्रोफेसर माणिक राव, गामा, प्रो० एकनाथ मूांत और प्रो० शहा इस बात के आज जीते जागते दृष्टान्त हैं । हमारा भोजन हमी को खाना और पचाना पड़ता है । केवल भोजन की तरफ देखने से अथवा उसकी खुशबू से अथवा उसकी कोरी तारीफ से ही सिर्फ हमारा पेट कभी नहीं भर सकता; वैसे ही अपना, बल, तेज, सामर्थ्य, स्वातंत्र्य और वैभव भी हम ही को कमाना पड़ता है । पूर्वजों की कोरी तारीफ से कुछ भी नहीं हो सकता । यद्यपि आज हमारा बहुत कुछ पतन हुआ है, तो भी सदाचार द्वारा हम पुनः ब्रह्मचारी यानी वीर्यवान और बली हो सकते हैं । सैकड़ों प्रो० माणिकराव और सहस्रां प्रो० शहा इस भारत भूमि में पुनः निर्माण हो सकते हैं । याद रखो, केवल सदाचारी पुरुष ही ब्रह्मचारी और उन्नत हो सकते हैं न कि दुराचारी । व्यभिचारी पुरुष ! मुर्खाने हुये पेड़ जैसे पानी मिलने से पुनः सजीव और चैतन्यमय हो सकते हैं वैसे ही सदाचरण से हमारी सम्पूर्ण गुप्त शक्तियां खुल पड़ती हैं, और शक्तियां खुलते ही फिर हम अपने पूर्वजों की तरह अपना बल तेज व पराक्रम निश्चयपूर्वक सर्वत्र दिखाया सकते हैं ।

८—ब्रह्मचर्य व आश्रम चतुष्टय

हमारे शास्त्रकारों ने शास्त्रों में “प्रकृति के नियमानुसार” चार आश्रम निर्धारित किये हैं । उनमें से प्रथम और सब से

२८ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम है। मानों वह आश्रम सम्पूर्ण आश्रमों की नींव है और वास्तव में है भी ऐसा ही। ब्रह्मचर्याश्रम की मर्यादा उन्होंने पुरुष की २५ वर्ष की और स्त्री की १६ वर्ष की “पूर्ण दृष्टि” से निश्चित की है। इसमें तिल भर फर्क नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति इस नियम को तोड़े तो प्रकृति भी उस व्यक्ति को तोड़ डालती है। प्रकृति के नियम परम कठोर हैं; जो उन नियमों के अनुसार चलता है उसे वे अमृत के समान फल देने वाले होते हैं और जो उनका अतिक्रमण करता है उसे वे विपतुल्य संहारक बन जाते हैं। सद्गुणयोग करने से अग्नि जैसे परम उपकारी हो सकती है और दुर्गुणयोग करने से वही अग्नि जैसे महान विनाशक बन जाती है, ठीक यही न्याय प्रकृति के सम्पूर्ण नियमों का भी समन्वित है।

ब्रह्मचर्य दो प्रकार के हैं। एक “नैष्ठिक” और दूसरा “उपकुर्वाण” आजन्म ब्रह्मचारी को “नैष्ठिक” कहते हैं और गुरुगृह में यथायोग्य ब्रह्मचर्य पालन कर, विद्या प्राप्ति के अनन्तर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वाले ब्रह्मचारी को ‘उपकुर्वाण’ कहते हैं।

यदि कोई आजन्म-भरण ब्रह्मचर्यव्रत धारण करे तो फिर पूछना ही क्या? वह इस लोक में सचमुच देवता ही के तुल्य पूज्यनीय बन जाता है; ऐसे पुरुष बहुत कम हैं। उदाहरणार्थ:— श्री समर्थ रामदास स्वामी, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, वगैरह इसी उच्चश्रेणी के आदर्श ब्रह्मचारी महत्तमा हुये हैं जिनको आज संसार से पूजे जाते हुये हम आप प्रत्यक्ष देख रहे हैं।

❁ ब्रह्मचर्य और विद्यार्थी ❁

[ २९ ]

दूसरा आश्रम 'गृहस्थाश्रम' है। इसकी मर्यादा २५ से लेकर ५० वर्ष तक की निश्चित की गई है। इसमें धर्माचरण से चलकर केवल सु-प्रजा निर्माण करने की आज्ञा है, न कि कु-प्रजा।

तीसरा ५० से लेकर ७५ वर्ष तक 'वानप्रस्थाश्रम' है। इस अवस्था में अपनी स्त्री को माता तुल्य मान कर, उसके साथ विषय-रहित शुद्ध व्यवहार रखने की आवश्यकता है।

चौथा और अन्तिम 'सन्यासाश्रम' है, जिसमें कि सर्वसंग परित्याग कर आत्म-कल्याणार्थ एकान्त का आश्रय लेना पड़ता है और अहर्निश ब्रह्मचिन्तन करना पड़ता है, न कि विषय चिन्तन।

एक मात्र ज्ञानी और विरक्त पुरुष ही सन्यास का अधिकारी हो सकता है। मूर्ख व रोगी पुरुषों को सन्यासी होना पूर्ण लाञ्छना-स्पद और अवनतिप्रद है। मूर्ख पुरुष खास कर पेट के लिये ही बीच में सन्यासी बाबा बन जाते हैं। लेखक में ऐसे कई मूर्ख और दुराचारी सन्यासी और कई अधम वानप्रस्थाश्रमी अपनी आँखों देखे हैं और गृहस्थाश्रमियों को तो आप हम सब ही देख रहे हैं।

६ ब्रह्मचर्य और विद्यार्थी

ब्रह्मचर्याश्रम को विषयरूपी सुरङ्ग से उड़ाने वाले आज लाखों करोड़ों स्त्री-पुरुष समाज में जिधर देखो उधर चारों ओर दिखाई दे रहे हैं। जड़ काटने से जैसे पेड़ की स्थिति होती है, वैसे ही खराब और गिरी दशा ब्रह्मचर्यरूपी जड़ को काटने वाले गृहस्थाश्रमियों की हो गई है। “नष्टे मूले नैव शाखा न पत्रम्” इस न्याय

२० ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

से बेचारे दिन व दिन सूखे जा रहे हैं और निःसन्तान बन रहे हैं। बाल पके हुये, अन्धे बने हुये, चश्मे लगे हुये, कमर दूटी हुई, बाहर भीतर रोगों से घुले हुये, आँख गाल अन्दर धँसे हुये, दुःखी दुर्बल और निरुत्साही बने हुये, निःसत्त्व निस्तेज बन कर अत्यन्त डरपोक बने हुये, सब तरह से आत्म-पतित, पापी, और गुलाम बने हुये, असंख्य दुखों में सने हुये और जिन्दी ठठरी बने हुये, तिस पर भी ध्यान-शूकर की तरह कामाग्नि में जलते हुये, ऐसे २०—२५ वर्ष के निर्वीर्य बूढ़े विद्यार्थी और गृहस्थाश्रमी ही आज सर्वत्र ढ़िखलाई दे रहे हैं ! हा ! यह दृश्य वड़ा ही भयानक मालूम हो रहा है। इस हृदयद्रावक दृश्य से भारत-प्रेमियों का हृदय आज भीतर ही भीतर जल रहा है। जिनके ऊपर भारत का सच्चा उद्धार निर्भर है, जो कि भारत के मुख्य आशास्थल और आधारस्तम्भ हैं ऐसे नवजवानों को ऐसी पतित और शोकपूर्ण दशा में देख कर किस भारतपुत्र का हृदय दुख से हिल नहीं जाता ! हमें तो रुलाई आने लगती है।

प्रभो ! यह हमारा वड़ा ही भारी पतन हुआ है। जो भारत एक समय परमोच्च उन्नति का केन्द्र था, जिस भारतवर्ष में हजारों बलशाली और वीर्यशाली नरसिंह वास करते थे, जिसकी ओर कोई भी राष्ट्र आँख उठाकर नहीं देख सकता था, जो सम्पूर्ण विद्याओं में सब का गुरु था, जिसका प्रभाव सम्पूर्ण दुनिया पर पड़ा हुआ था, जिसके अंगुलिनिर्देश से सम्पूर्ण दिङ्-मण्डल काँप उठता था, वही भारत आज गुलामों का कैदखाना सा बन रहा है और सब तरह से पीसा, निचोड़ा और जलाया जा रहा है। हाय ! इससे बढ़कर पतन और कौनसा हो सकता है ? नहीं, हमको अब

❁ काम का दमन ❁

[ ३१ ]

तुरन्त उठ खड़े होना चाहिये । इसी में हमारी भलाई है । यदि न चेतेंगे तो भारत का चिन्ह तक मिट जाने की संभावना है । इसलिये ऐ मेरे भारतवासी भ्रातृ-भगिनी-मित्रगण ! अब सावधान होइये ! आँखें खोलकर अपने तथा अन्य देशों की ओर ज़रा निहारिये और निहार कर अपना पूर्व वैभव प्राप्त करने के लिये निश्चित से कटिबद्ध हो ब्रह्मचर्य द्वारा अपना पुनः उद्धार कर लीजिये । एक ब्रह्मचर्य ही के द्वारा हमारा उद्धार होना 'सहज-संभव' है, अन्य सब उपाय बूथा हैं । विन्दु को साधने वाला सप्तसिन्धुओं को भी अपनी मुट्ठी में—कून्हे में ला सकता है । संपूर्ण संसार में ऐसी कोई भी वस्तु व स्थिति नहीं है, जिसे ब्रह्मचारी पुरुष प्राप्त न कर सकता हो । हाथी का रहस्य जैसे अंकुश है वैसे ही हमारे सम्पूर्ण विद्या, वैभव और सामर्थ्य का रहस्य एक मात्र हमारा ब्रह्मचर्य ही है । अभी भी ब्रह्मचारी बन सकते हैं और वीर्यधारण कर के अपना तथा भारत का सच्चा उद्धार कर सकते हैं । अतः ऐ मेरे परम प्रिय भारतपुत्रों ! अब नौंद को छोड़ दो* अवतक बहुत-कुछ सो चुके हो और खो चुके हो । अब जागृत होकर खड़े हो जाओ और खड़े होकर निश्चय के साथ अपने पैर सिंह के समान उन्नति की ओर निर्भयता से बढ़िये । अवश्य विजय होगी, निश्चय जानो ।

१०—काम का दमन

“काम का उद्भव ही न होने दो”

एक मनुष्य ने शेर का बच्चा पाला था । बच्चा बहुत गरीब

*‘He who sleeps, his Fortune sleeps’.

३२ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

था । एक दिन नींद में वह बच्चा मालिक का बांया हाथ चाटने लगा चाटते चाटते दांत लग जाने से हाथ का थोड़ा सा खून निकला । अब बच्चा कान टेढ़ा किये खून चाटने लगा । तकलीफ के मारे मालिक जग पड़ा और अपना हाथ हटाना चाहा । किंचित् हाथ हटाते ही शेर एकदम खड़ा हो गया और जाति स्वभावानुरूप “गुर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र” गर्जन कर उसने हाथ को पंजे के नीचे मजबूती से दबा लिया और फिर रक्त चाटने लगा । मालिक ने सोचा, “अरे वाप रे ! अब तो मामला बड़ा वेदव है । यदि मैं इसको और भी प्यार करूँ तो यह मुझे फाड़ खाये बिना नहीं रहेगा” उसने निश्चय किया और तुरन्त सन्दूक में से पिस्तौल मँगवाया । पिस्तौल मिलते ही “रे नमक हराम” ऐसा कह कर तत्काल धड़ाके से गोली छोड़कर उसे मार डाला ।

ऐ मेरे प्यारे भ्रातृ-भगिनी-मित्र गए ! यदि कामरूपी शेर तुम्हारा शोषण करना चाहता हो तो तुम भी उसे फौरेन मार डालो । २५ वर्ष तक विषय से विलकुल दूर रहो । उसका स्मरण तक मत करो क्योंकि पूर्वांक नव-मैथुनों में से प्रत्येक मैथुन ब्रह्मचर्य का नाशक है । अन्ये को जैसे शीशा दिखलाना व्यर्थ है । वैसे ही कामान्ध पुरुष को भी उपदेश करना व्यर्थ है । उल्लू तो दिन में ही नहीं देख सकता परन्तु कामान्ध पुरुष दिन और रात दोनों में नहीं देख सकता । कामान्ध पुरुष डबल उल्लू होता है । जो विषय अत्यन्त दुःखप्रद, त्याज्य व नरकप्रद है वह मूर्खों को अत्यन्त प्रिय व मधुर मालूम होता है और जो परमार्थ मनुष्य को इसी जीवन में अमृत तुल्य फल शान्ति देने वाला और अन्त में मुक्तिप्रद है तथा जिसका आधार ब्रह्मचर्य के ऊपर ही मुख्यतः निर्भर है, वह परमार्थ उन्हें विष के समान कड़वी

काम का दमन

[ ३३ ]

मालूम होता है। जो वास्तव में विप है उसे अमृत समझना और जो प्रत्यक्ष अमृत है उसे विप समझना ये घोर पाप के लक्षण हैं। यह बात निःसन्देह सत्य है कि जिसे सांप काटता है उसको मिर्च भी तीत नहीं लगती और न नीम कड़वी लगती है परन्तु चीनी उसे बहुत ही कड़वी लगती है। ठीक यही हालत विषय रूपों सप से वंशित पुरुषों की भी समझिये। उन्हें सब उलटी ही बातें सूझती हैं और उनकी दृष्टि में सब पाप ही पाप भरा रहता है। वे सभी स्त्रियों की ओर पाप-दृष्टि से देखते हैं और इस प्रकार व्यर्थ पाप के भागी बन अन्त में नरक को जाते हैं। आज बड़े बड़े देवस्थानों में भी नाच रंग व व्यभिचार घुस गया है। कई मन्दिरों पर तो भद्दे भद्दे चित्र भी खुदे हुये हैं। हा ! पापी पुरुष क्या नहीं करेंगे ? गङ्गा जी में । तक डूबे रहने पर भी उनकी पाप दृष्टि नहीं जाती। देव-दर्शन के हाने मन्दिरों में और वायु सेवन के मिस से घाट पर तथा ज जगह कई गीध बैठे हुए नित्य दिखाई देते हैं। धिक्कार है, नारकी जीवों को !

अहो न हिरदय धस्यो, भयो पुण्य का नाश । मानों चिनगी आग की, परी पुरानी धास ॥ १ ॥ विविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥ २ ॥

भगवान् कहते हैं:—नरक के तीन प्रचण्ड महाद्वार रात दिन खुले हुए हैं। सब से पहला द्वार काम का है जिसमें कि विषय के गुलाम बलात् खींचे और दूसे जाते हैं। दूसरा द्वार क्रोधी पुरुषों के लिये है और तीसरा द्वार लोभियों के लिये है।

३४ ]

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

कामी पुरुष जीते जी ही नरक का अनुभव करने लगता है; वह जीते जी ही मुर्दा बन जाता है । जगद्गुरु श्री दत्तात्रेय मुनि कहते हैं:—“जो लोग गन्दगी से सदा भरे हुए मल मूत्र के स्थानों में रसमाण रहते हैं, ऐसे नारकी जीव नरक से क्यों कर तर सकते हैं ? ऐ पुरुषो ! तुम चर्ममयी नरक-कुंड की ओर क्यों ताकते हो ? क्या नरक के कीट बनने के लिए ? छीं छीं ! इससे तुम्हारा कैसे उद्धार होगा ? क्या यहीं स्वर्ग-सुख है । जरा तुमही सोचो कि यह स्वर्ग-भोग है या नरक-भोग ? इस प्रकार तो शूकर, कूकर और गोबर के कीड़े भी आनन्द मनाते हैं ! इनसे फिर तुम्हारा दर्जा ऊँचा कैसा ? ऊँचे दर्जे के लिये हमें अवश्य अपने आचार-विचार भी ऊँचे ही रखने चाहियें ! केवल मनुष्य की देह धारण कर लेने से कोई “मनुष्य” नहीं हो सकता । विद्या और विनय, तप व शान्ति, कान्ति व दान्ति ( लावण्य तथा दमन शक्ति ) गुण व अ-गर्व, धर्म व अदमम इत्यादि सद्गुणों से ही मनुष्य ‘मनुष्य’ बन सकता है और ईश्वरत्व को प्राप्त हो सकता है । परन्तु इन सब की जड़ एक मात्र ब्रह्मचर्य है, यह सत्य बात कभी न भूलो ।

कामान्ध मनुष्य तारुण्य के मद से विषय में प्रीति भले ही रखता हो और अपनी मनमानी भले ही करता हो; परन्तु वे ही विषय उसे आगे इस रीति से पटक देते हैं, जैसे पेड़ों को बाढ़ और आंधी ! बेचारा मोहवश विषय में फँस कर “सुख की बुद्धि” से स्त्री-संग करता है और अपने ही वीर्य का नाश कर अपने को धन्य व कृतार्थ समझता है; जैसे कुत्ता सूखी हड्डी को चबाते समय मुँह से निकले हुए खून को सूखी हड्डी से निकला हुआ समझ कर अपना ही खून चूस कर वह मूर्ख बड़ा खुश होता है; जैसे विच्छू

❁ काम का दमन ❁

[ ३५ ]

या खटमल की शय्या कदापि सुखकर नहीं हो सकती, वैसे ही विषयी पुरुष भी कदापि सुखी नहीं हो सकते, वे सदा बेचैन बने रहते हैं। “दुःखी सदा को ? विपयानुरागी !” ऐसा श्रीमत् शङ्कराचार्य भी कहते हैं। सच है, सांप के फन के नीचे बैठे हुआ चूहा कब तक छाया का सुख मनावेगा ? मेढक, सांप द्वारा आधा निगले जाने पर भी जैसा वह मूर्ख मक्खियों के लिये मुँह खोलता है, वैसे ही कामी पुरुष भी अनेक रोगों से अधमरे होने पर भी विषय सेवन के लिये हाथ-पैर फैलाते ही हैं। गढ़ही के लातों से नाक-मुँह फूट जाने पर भी जैसे वह गढ़हा गढ़ही की आशा नहीं छोड़ता, उसके पीछे पीछे ही दौड़ता है; वैसी ही दुर्दशा काम के कीटों की भी होती है; वे सब तरह से नष्ट-भ्रष्ट व दुखी होने पर भी अपनी कुदुष्टि को नहीं त्यागते और विषय के पीछे मारे मारे फिरते हैं। दाढ़ को खुजलाने से जैसे वह कदापि शमन नहीं हो सकती, उसे वैसे ही छोड़ देने तथा स्नान व उपवास द्वारा शरीर की सफाई रखने ही से वह शान्त हो सकती है, वैसे ही काम के सेवन से काम की शान्ति कदापि नहीं हो सकती। ऐसा आज तक किसी ने न देखा और न सुना ही है। सांप को छेड़ने से नहीं किन्तु सांप से दूर रहने ही से जैसे हम बच सकते हैं; वैसे ही काम के सेवन से नहीं किन्तु काम से दूर रहने ही से काम की सच्ची शान्ति हो सकती है और हम भी पूरा शान्त व सुखी बन सकते हैं। यदि कोई नासारोगी सफेद मिट्टी के तेल को, पानी समझ कर, जलते हुए भोंपड़े पर डाले, तो कैसा उल्टा परिणाम होगा ? क्या कभी ईधन से अग्नि शान्त हो सकती है। कोई कहेगा, “हाँ, हो सकती है, ढेर

३६ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

सी लकड़ी डाल देने से आगी बुझ सकती है।” हम कहते हैं, “अधिक विषय सेवन करने से फिर तुम भी अकाल में बुझ जाओगे ! एक शराबी ने ऐसा ही किया । एक दिन उसने खूब शराब पी ली । नतीजा यह हुआ कि एक ही घंटे में उसकी दुर्बल बनी हुई खोपड़ी नशे के मारे फट गई और वह मर गया । यथाति राजा ने अपने पुत्र की भी आयु ली और तमाम उम्र भर उसने विषय-सेवन किया परन्तु उसकी शान्ति नहीं हुई । अन्त में वह चर्या बन गया, उसको क्षय हो गया । इसी कारण संत उपदेश करते हैं:—

( भजन ध्रुव-गजल की )

“विषयों से मन को तृप्त कराना नहीं अच्छा । जलती अगिनि को घी से बुझाना नहीं अच्छा ॥ १ ॥ सुख भोगते ये जगत् के सभी हैं नाशमान । तृष्णा बढ़ा के जी को फँसाना नहीं अच्छा ॥ २ ॥ है गच्छतीति* जगत् धाम दुःख का भारी । रंग रंग के खेल देख लुभाना नहीं अच्छा ॥ ३ ॥ “धन धाम इष्ट मित्र रूप नारि और पुत्र । हरगिज धमण्ड इनका न करना कभी अच्छा ॥ ४ ॥ ‘वामन’ है आयु वीततो अब से भी जरा चेत । दुर्लभ शरीर पाके गँवाना नहीं अच्छा ॥ ५ ॥ अतएव, प्यारे भाइयो ! जहाँ तक हो सके वहाँ तक, मनुष्य को

  • जानेवाला किंवा बदलने वाला जगत् ।

काम का दमन

३७ ]

चेकाम बनाने वाले इस दुर्भर यानी कभी भी त्रम न होने वाले महापैट्ट व पापी काम से सदा दूर रहा ! इसी में कल्याण है ।

‘यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णात्तय सुखस्यैते नाहृतः षोडशीं कलाम् ॥ १ ॥

अर्थात्, निष्कामता में यानी विषय वैराग्य में जो सुख भरा हुआ है उसका सोलहवाँ हिस्सा भी सुख संसार के व स्वर्ग के समस्त विषयों में तथा दिव्य ऐश्वर्यादि में नहीं है । अतः इस महाशनो महापाप्मा काम रिपु को “भगवान् के आज्ञानुसार” तुरंत मार डालो, नहीं तो वह दुष्ट तुम्हें ही मार डालेगा ! याद रखो ।

( भजन )

अनारी मन काम नरक को मूल ॥ १ ॥ रङ्ग रूप में रहो लुभाना, भूल गयो हरिनाम दिवाना । या यौवन का कौन ठिकाना, दो दिन में हो धूल ॥२॥ अमृत-भरे कलश बतलाये, धरि धरिके आनन्द मनावे । चमड़े की थैली है मूरख, जापै रहयो बड़ी फूल ॥३॥ ‘जा मुख को चन्दाकर मानो, थूक लार वामें लिपटानो । छी छी छी छी ! तुमारी मतिपर, विष्टा में गयो भूल ॥४॥ कैसा भारी धोका खाया, हाड़चाम पर मन ललचाया । ‘वामन’ इस पर गौर किया कुछ ? यही कालका मूल ॥५॥