ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकाम का दमन
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चेकाम बनाने वाले इस दुर्भर यानी कभी भी त्रम न होने वाले महापैट्ट व पापी काम से सदा दूर रहा ! इसी में कल्याण है ।
‘यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णात्तय सुखस्यैते नाहृतः षोडशीं कलाम् ॥ १ ॥
अर्थात्, निष्कामता में यानी विषय वैराग्य में जो सुख भरा हुआ है उसका सोलहवाँ हिस्सा भी सुख संसार के व स्वर्ग के समस्त विषयों में तथा दिव्य ऐश्वर्यादि में नहीं है । अतः इस महाशनो महापाप्मा काम रिपु को “भगवान् के आज्ञानुसार” तुरंत मार डालो, नहीं तो वह दुष्ट तुम्हें ही मार डालेगा ! याद रखो ।
( भजन )
अनारी मन काम नरक को मूल ॥ १ ॥ रङ्ग रूप में रहो लुभाना, भूल गयो हरिनाम दिवाना । या यौवन का कौन ठिकाना, दो दिन में हो धूल ॥२॥ अमृत-भरे कलश बतलाये, धरि धरिके आनन्द मनावे । चमड़े की थैली है मूरख, जापै रहयो बड़ी फूल ॥३॥ ‘जा मुख को चन्दाकर मानो, थूक लार वामें लिपटानो । छी छी छी छी ! तुमारी मतिपर, विष्टा में गयो भूल ॥४॥ कैसा भारी धोका खाया, हाड़चाम पर मन ललचाया । ‘वामन’ इस पर गौर किया कुछ ? यही कालका मूल ॥५॥