भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

११—प्रकृति का स्वभाव

प्रकृति का स्वभाव अत्यन्त कठोर और दयालु है । वह अत्यन्त न्यायप्रिय है । न्याय में वह चूमा नहीं करना जानती । सदाचारियों के लिए प्रकृति परम प्यारी माता है और दुराचारियों के लिये वह पूरी राक्षसी है । वह स्वयं राक्षसी कदापि नहीं है । वह परम दयालु जगन्माता है । केवल दुराचारियों ही को वह राक्षसी जैसी प्रतीत होती है । परन्तु दण्ड में भी हमें सुधारने का ही उसका पवित्र हेतु होता है । ठोकर खाने ही से मनुष्य सावधान होता है ।

आज अत्यन्त वीर्यनाश के कारण तरुण समाज अत्यन्त नाशोन्मुख हो रहा है और दिन पर दिन रसातल को जा रहा है । चाहे तुम कितने ही अंधेरे में और कितने ही चालाकी से वीर्य-नाश करो और अपने को कितना ही सुरक्षित व बुद्धिमान समझो और कुकर्मों को छिपाने की कैसी ही कोशिश करो, परन्तु वीर्य-नाश होते ही मृत्यु तत्काल तुम्हारे द्वार पर आ डटती है और तुम्हारा इन्तजार करती है । प्रकृति माता अपने हाथ में डंडा लिये तुम्हारी वह नीच कृति देखती है तथा प्रत्येक वृद्ध के लिये तुम्हारे मर्म स्थानों पर कठोर डंडा प्रहार करती है । ज्यों ज्यों तुम वीर्यनाश करोगे त्यों त्यों वह तुम्हें मारते मारते वेदम व अधमरा कर डालेगी । तब भी यदि नहीं चेतोगे व सुधरोगे तब अन्त में तुम्हारा इन्तजार करती हुई मृत्यु की ओर तुम्हें, सड़े फल की तरह, फेंक देगी, तुम्हें उठा के नरककुण्ड में बिछा देगी !

आज कितने ही तरुणों के बदन पर हम उन डंडों की चोटों