ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ प्रकृति का स्वभाव ❁
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के गहरे निशान प्रतिदिन देख रहे हैं। कितने ही हतभागी लोग महारोगियों की तरह खटिया पर पड़े पड़े तड़फड़ा रहे हैं कोई गर्मी से पीड़ित है। कोई फिर भी, उन निशानों को लिये हुए समाज में इधर-उधर भूठे ही छाती निकाल कर ऐंठते हुए अकड़ कर घूम रहे हैं। कोई माला फेर रहे हैं और इधर नाड़ी भी टटोल रहे हैं और मन में राम का नहीं, किन्तु काम का जप कर रहे हैं। अब कहिये ऐसे लोगों की क्या गति होगी ? बेचारों की “इतो भ्रष्टस्तोभ्रष्टः” ऐसी ही त्रिशंकु की तरह दुर्गति होगी, और क्या ? दम्भाचार में न दीन है न दुनिया ही है।
“धंचक भक्त कहाय राम के ।
किंकर कंचन होय काम के ॥”
वहुत से बालक तो ऐसी दुर्गति को पहुंच गये हैं कि उन्हें भात तो क्या पर दूध तक नहीं पच सकता, पाखाना भी साफ नहीं होता। खाना तथा पाखाना में बड़ी ही दुर्दशा हो गई है। भोजन कर भी लिया तो पचता नहीं। इधर खाया और उधर निकल गया। यदि पचा भी तो उसका सार वीर्य शरीर में रहने नहीं पाता। रोज स्वप्रदोष अर्थात् धातुक्षय हुआ करता है। फिर छिपे छिपे वैद्यों की दूकान दृढ़ते हैं ! परन्तु उनको याद रहे कि वीर्यनाश करनेवाला यदि साक्षात् धन्वन्तरि ही क्यों न हो तथापि वह भी अपने को कदापि बचा नहीं सकता। फिर दूसरे वीर्यहीनों को वह कैसे बचा सकता है ? आजकल के डाक्टर वैद्य क्या धन्वन्तरि से भी ज्यादा बढ़ गये हैं ? हाँ ! लूटने मारने में वे अवश्य बड़े-चढ़े हुये हैं। किसी ने वैद्यों को “यमराज का भाई” कहा है, सो वहुत ही यथार्थ है। यम तो केवल प्राण ही हर लेता है पर वैद्य प्राण