भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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ॐ ब्रह्मचय ही जीवन है ॐ

और धन दोनों लूट लेते हैं। दवाओं से रोग “जड़” से अच्छे नहीं हो सकते। दवा से रोग थोड़ी देर के लिये दब सकते हैं सही, परन्तु कुछ अरसे के बाद वे दूसरी शक्ति में पैदा होते हैं। “मरण बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की” इसका यही प्रत्यक्ष प्रमाण है कि “ज्यों ज्यों डाक्टरों व वैद्यों की संख्या बढ़ती जाती है त्यों त्यों रोग और रोगियों की भी संख्या बढ़ती ही जाती है और इस बात को कोई जानना चाहता हो, तो वह अखबारों में दवाओं के विज्ञापनों को देख सकता है। प्यारे मित्रों, विदेशी लोग इन विज्ञापनों को देख कर दिलमें क्या सोचते होंगे ?

हम ही अपने डाक्टर हैं।

भाइयों ! लौटो ! प्रकृति माता की शरण में आओ। वह परम दयालु है। तुम्हारा जरूर सुधार करेगी। विश्वास रखो। प्रकृति माता की दया बिना कोई एक घण्टा भी नहीं जी सकता। नाक, कान, मुंह, मल, मूत्र, त्वचा इत्यादि द्वारा, बल्कि रोम रोम से, वह हमारे भीतर का संपूर्ण जहर हरदम बाहर निकाल कर फेंकती रहती है और हमें चंगा किया करती है। अतः हमें चाहिये कि प्रकृति के “पञ्चामृत” का अर्थात् शुद्ध हवा, प्रकाश, पानी, भूमि व आकाश ( Space ) इनका रोज यथेष्ट पान करें और कुकर्मों को त्याग कर सुकर्मों द्वारा अपना पुनरुद्धार कर लें। हमारा उद्धार हमारे ही हाथ में हैं। वस्तुतः हम ही अपने डाक्टर हैं, गुरु हैं।

पद—( राग—असावरी )

“कर्मों का फल पाना होगा । धृ० ॥

“क्यों न अरे तू चेत में आवे,

सभी ठाट तज जाना होगा।