भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ प्रकृति का स्वभाव ❁

[ ४१ ]

विषय भोग से सभी तरह बच, बचा न तो सङ्ग जाना होगा ॥ १ ॥ “सुर-दुर्लभ-तनु भोगी श्वानवत्, क्या श्व अब कहलाना होगा । धर्माधर्म कङ्कू नहीं मान्यो, कर्म-दण्ड यही पाना होगा ॥२॥ अन्त समय परे मन मूरख ! जड़ल तेरा ठिकाना होगा । कुछ इस जग में कीर्ति कमा ले, धर्महि ले साथ जाना होगा ॥३॥ “भूलि गयो कर्तव्य आपनो, देख बहुत पछताना होगा । आँखे रहते अन्धो मत बन, शुभ विवेक से तरना होगा ॥ ४ ॥ “जैसा जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल खाना होगा । अब भी ‘वामन’ चेत में आजा, नहीं तो दुर्गति पाना होगा ॥ ५ ॥ “गतं न शोच्यं ।”

“बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेई ।”

सचमुच हमको अब जरूर सम्हलना होगा । जलते हुए मकान से बाहर निकल आने में ही बुद्धिमान्नी है; उसी में जिन्दगी है । यदि हम अपना कल्याण चाहते हैं तो महापुरुषों के सद्गुपदेशानुसार हमको तन-मन-धन से शीघ्रतया जरूर चलना होगा । माता