ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन ❁
पिता अथवा गुरु यदि अधर्ममयी आशा करते हैं तो उनकी वह आशा भ्रुव प्रह्लाद, शुक्र, आदि की तरह कदापि न मानो। भीष्मपितामह ने अपने ब्रह्मचर्य के भंग करने की गुरु की अनुचित आशा बिल्कुल नहीं मानी; तब गुरु शिष्य में युद्ध छिड़ा। अन्त में परशुराम जी को उस महान् प्रतापी अखण्ड ब्रह्मचारी धर्मप्रतिज्ञ भीष्म के सामने हार माननी ही पड़ी। अहा ! क्या ही यह ब्रह्मचर्य का प्रताप है ? हमको भी अपने ब्रह्मचर्य के पालन में अब ऐसा ही दृढ़प्रतिज्ञ होना चाहिये।
“धैर्यं न टूटै पड़े चोट सौ घन की । यही दशा होना चाहिये निज मन की ॥”
सबमुच ‘हृदय से’ चाहने वालों को जैसी बुराई सहल है, वैसी भलाई भी सहल है। अतएव मनुष्य को चाहिये कि वह अपने दुष्ट मन को हठपूर्वक या विवेकपूर्वक विषय से हटावे। बुराई एकाएक दूर नहीं हो सकती यह बात सच है परन्तु “पुरुषस्य प्रयत्न शीलस्य असाध्यं नास्ति।” पुरुषार्थी पुरुष के लिये संसार में कुछ भी असाध्य व अशक्य नहीं है। हृदय से उचित प्रयत्न करने पर सब कुछ सरल है। अभ्यास से असाध्य भी साध्य हो जाता है। बड़े बड़े अफीमची और शराबी भी अपनी मात्रा को थोड़ी थोड़ी घटाते घटाते अन्त में व्यसन-मुक्त हो गये हैं, इस बात को कभी न भूलो। वैसे ही हम भी सुधर सकते हैं।