भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ काम का दमन ❁

[ ३५ ]

या खटमल की शय्या कदापि सुखकर नहीं हो सकती, वैसे ही विषयी पुरुष भी कदापि सुखी नहीं हो सकते, वे सदा बेचैन बने रहते हैं। “दुःखी सदा को ? विपयानुरागी !” ऐसा श्रीमत् शङ्कराचार्य भी कहते हैं। सच है, सांप के फन के नीचे बैठे हुआ चूहा कब तक छाया का सुख मनावेगा ? मेढक, सांप द्वारा आधा निगले जाने पर भी जैसा वह मूर्ख मक्खियों के लिये मुँह खोलता है, वैसे ही कामी पुरुष भी अनेक रोगों से अधमरे होने पर भी विषय सेवन के लिये हाथ-पैर फैलाते ही हैं। गढ़ही के लातों से नाक-मुँह फूट जाने पर भी जैसे वह गढ़हा गढ़ही की आशा नहीं छोड़ता, उसके पीछे पीछे ही दौड़ता है; वैसी ही दुर्दशा काम के कीटों की भी होती है; वे सब तरह से नष्ट-भ्रष्ट व दुखी होने पर भी अपनी कुदुष्टि को नहीं त्यागते और विषय के पीछे मारे मारे फिरते हैं। दाढ़ को खुजलाने से जैसे वह कदापि शमन नहीं हो सकती, उसे वैसे ही छोड़ देने तथा स्नान व उपवास द्वारा शरीर की सफाई रखने ही से वह शान्त हो सकती है, वैसे ही काम के सेवन से काम की शान्ति कदापि नहीं हो सकती। ऐसा आज तक किसी ने न देखा और न सुना ही है। सांप को छेड़ने से नहीं किन्तु सांप से दूर रहने ही से जैसे हम बच सकते हैं; वैसे ही काम के सेवन से नहीं किन्तु काम से दूर रहने ही से काम की सच्ची शान्ति हो सकती है और हम भी पूरा शान्त व सुखी बन सकते हैं। यदि कोई नासारोगी सफेद मिट्टी के तेल को, पानी समझ कर, जलते हुए भोंपड़े पर डाले, तो कैसा उल्टा परिणाम होगा ? क्या कभी ईधन से अग्नि शान्त हो सकती है। कोई कहेगा, “हाँ, हो सकती है, ढेर