भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य ही जीवन है

कामी पुरुष जीते जी ही नरक का अनुभव करने लगता है; वह जीते जी ही मुर्दा बन जाता है । जगद्गुरु श्री दत्तात्रेय मुनि कहते हैं:—“जो लोग गन्दगी से सदा भरे हुए मल मूत्र के स्थानों में रसमाण रहते हैं, ऐसे नारकी जीव नरक से क्यों कर तर सकते हैं ? ऐ पुरुषो ! तुम चर्ममयी नरक-कुंड की ओर क्यों ताकते हो ? क्या नरक के कीट बनने के लिए ? छीं छीं ! इससे तुम्हारा कैसे उद्धार होगा ? क्या यहीं स्वर्ग-सुख है । जरा तुमही सोचो कि यह स्वर्ग-भोग है या नरक-भोग ? इस प्रकार तो शूकर, कूकर और गोबर के कीड़े भी आनन्द मनाते हैं ! इनसे फिर तुम्हारा दर्जा ऊँचा कैसा ? ऊँचे दर्जे के लिये हमें अवश्य अपने आचार-विचार भी ऊँचे ही रखने चाहियें ! केवल मनुष्य की देह धारण कर लेने से कोई “मनुष्य” नहीं हो सकता । विद्या और विनय, तप व शान्ति, कान्ति व दान्ति ( लावण्य तथा दमन शक्ति ) गुण व अ-गर्व, धर्म व अदमम इत्यादि सद्गुणों से ही मनुष्य ‘मनुष्य’ बन सकता है और ईश्वरत्व को प्राप्त हो सकता है । परन्तु इन सब की जड़ एक मात्र ब्रह्मचर्य है, यह सत्य बात कभी न भूलो ।

कामान्ध मनुष्य तारुण्य के मद से विषय में प्रीति भले ही रखता हो और अपनी मनमानी भले ही करता हो; परन्तु वे ही विषय उसे आगे इस रीति से पटक देते हैं, जैसे पेड़ों को बाढ़ और आंधी ! बेचारा मोहवश विषय में फँस कर “सुख की बुद्धि” से स्त्री-संग करता है और अपने ही वीर्य का नाश कर अपने को धन्य व कृतार्थ समझता है; जैसे कुत्ता सूखी हड्डी को चबाते समय मुँह से निकले हुए खून को सूखी हड्डी से निकला हुआ समझ कर अपना ही खून चूस कर वह मूर्ख बड़ा खुश होता है; जैसे विच्छू