ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकाम का दमन
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मालूम होता है। जो वास्तव में विप है उसे अमृत समझना और जो प्रत्यक्ष अमृत है उसे विप समझना ये घोर पाप के लक्षण हैं। यह बात निःसन्देह सत्य है कि जिसे सांप काटता है उसको मिर्च भी तीत नहीं लगती और न नीम कड़वी लगती है परन्तु चीनी उसे बहुत ही कड़वी लगती है। ठीक यही हालत विषय रूपों सप से वंशित पुरुषों की भी समझिये। उन्हें सब उलटी ही बातें सूझती हैं और उनकी दृष्टि में सब पाप ही पाप भरा रहता है। वे सभी स्त्रियों की ओर पाप-दृष्टि से देखते हैं और इस प्रकार व्यर्थ पाप के भागी बन अन्त में नरक को जाते हैं। आज बड़े बड़े देवस्थानों में भी नाच रंग व व्यभिचार घुस गया है। कई मन्दिरों पर तो भद्दे भद्दे चित्र भी खुदे हुये हैं। हा ! पापी पुरुष क्या नहीं करेंगे ? गङ्गा जी में । तक डूबे रहने पर भी उनकी पाप दृष्टि नहीं जाती। देव-दर्शन के हाने मन्दिरों में और वायु सेवन के मिस से घाट पर तथा ज जगह कई गीध बैठे हुए नित्य दिखाई देते हैं। धिक्कार है, नारकी जीवों को !
अहो न हिरदय धस्यो, भयो पुण्य का नाश । मानों चिनगी आग की, परी पुरानी धास ॥ १ ॥ विविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥ २ ॥
भगवान् कहते हैं:—नरक के तीन प्रचण्ड महाद्वार रात दिन खुले हुए हैं। सब से पहला द्वार काम का है जिसमें कि विषय के गुलाम बलात् खींचे और दूसे जाते हैं। दूसरा द्वार क्रोधी पुरुषों के लिये है और तीसरा द्वार लोभियों के लिये है।
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