ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
था । एक दिन नींद में वह बच्चा मालिक का बांया हाथ चाटने लगा चाटते चाटते दांत लग जाने से हाथ का थोड़ा सा खून निकला । अब बच्चा कान टेढ़ा किये खून चाटने लगा । तकलीफ के मारे मालिक जग पड़ा और अपना हाथ हटाना चाहा । किंचित् हाथ हटाते ही शेर एकदम खड़ा हो गया और जाति स्वभावानुरूप “गुर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र” गर्जन कर उसने हाथ को पंजे के नीचे मजबूती से दबा लिया और फिर रक्त चाटने लगा । मालिक ने सोचा, “अरे वाप रे ! अब तो मामला बड़ा वेदव है । यदि मैं इसको और भी प्यार करूँ तो यह मुझे फाड़ खाये बिना नहीं रहेगा” उसने निश्चय किया और तुरन्त सन्दूक में से पिस्तौल मँगवाया । पिस्तौल मिलते ही “रे नमक हराम” ऐसा कह कर तत्काल धड़ाके से गोली छोड़कर उसे मार डाला ।
ऐ मेरे प्यारे भ्रातृ-भगिनी-मित्र गए ! यदि कामरूपी शेर तुम्हारा शोषण करना चाहता हो तो तुम भी उसे फौरेन मार डालो । २५ वर्ष तक विषय से विलकुल दूर रहो । उसका स्मरण तक मत करो क्योंकि पूर्वांक नव-मैथुनों में से प्रत्येक मैथुन ब्रह्मचर्य का नाशक है । अन्ये को जैसे शीशा दिखलाना व्यर्थ है । वैसे ही कामान्ध पुरुष को भी उपदेश करना व्यर्थ है । उल्लू तो दिन में ही नहीं देख सकता परन्तु कामान्ध पुरुष दिन और रात दोनों में नहीं देख सकता । कामान्ध पुरुष डबल उल्लू होता है । जो विषय अत्यन्त दुःखप्रद, त्याज्य व नरकप्रद है वह मूर्खों को अत्यन्त प्रिय व मधुर मालूम होता है और जो परमार्थ मनुष्य को इसी जीवन में अमृत तुल्य फल शान्ति देने वाला और अन्त में मुक्तिप्रद है तथा जिसका आधार ब्रह्मचर्य के ऊपर ही मुख्यतः निर्भर है, वह परमार्थ उन्हें विष के समान कड़वी