ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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तुरन्त उठ खड़े होना चाहिये । इसी में हमारी भलाई है । यदि न चेतेंगे तो भारत का चिन्ह तक मिट जाने की संभावना है । इसलिये ऐ मेरे भारतवासी भ्रातृ-भगिनी-मित्रगण ! अब सावधान होइये ! आँखें खोलकर अपने तथा अन्य देशों की ओर ज़रा निहारिये और निहार कर अपना पूर्व वैभव प्राप्त करने के लिये निश्चित से कटिबद्ध हो ब्रह्मचर्य द्वारा अपना पुनः उद्धार कर लीजिये । एक ब्रह्मचर्य ही के द्वारा हमारा उद्धार होना 'सहज-संभव' है, अन्य सब उपाय बूथा हैं । विन्दु को साधने वाला सप्तसिन्धुओं को भी अपनी मुट्ठी में—कून्हे में ला सकता है । संपूर्ण संसार में ऐसी कोई भी वस्तु व स्थिति नहीं है, जिसे ब्रह्मचारी पुरुष प्राप्त न कर सकता हो । हाथी का रहस्य जैसे अंकुश है वैसे ही हमारे सम्पूर्ण विद्या, वैभव और सामर्थ्य का रहस्य एक मात्र हमारा ब्रह्मचर्य ही है । अभी भी ब्रह्मचारी बन सकते हैं और वीर्यधारण कर के अपना तथा भारत का सच्चा उद्धार कर सकते हैं । अतः ऐ मेरे परम प्रिय भारतपुत्रों ! अब नौंद को छोड़ दो* अवतक बहुत-कुछ सो चुके हो और खो चुके हो । अब जागृत होकर खड़े हो जाओ और खड़े होकर निश्चय के साथ अपने पैर सिंह के समान उन्नति की ओर निर्भयता से बढ़िये । अवश्य विजय होगी, निश्चय जानो ।
१०—काम का दमन
“काम का उद्भव ही न होने दो”
एक मनुष्य ने शेर का बच्चा पाला था । बच्चा बहुत गरीब
*‘He who sleeps, his Fortune sleeps’.