ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
पृष्ठ 47, कुल 199 में से
संदर्भ में पढ़ें२० ]
❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
से बेचारे दिन व दिन सूखे जा रहे हैं और निःसन्तान बन रहे हैं। बाल पके हुये, अन्धे बने हुये, चश्मे लगे हुये, कमर दूटी हुई, बाहर भीतर रोगों से घुले हुये, आँख गाल अन्दर धँसे हुये, दुःखी दुर्बल और निरुत्साही बने हुये, निःसत्त्व निस्तेज बन कर अत्यन्त डरपोक बने हुये, सब तरह से आत्म-पतित, पापी, और गुलाम बने हुये, असंख्य दुखों में सने हुये और जिन्दी ठठरी बने हुये, तिस पर भी ध्यान-शूकर की तरह कामाग्नि में जलते हुये, ऐसे २०—२५ वर्ष के निर्वीर्य बूढ़े विद्यार्थी और गृहस्थाश्रमी ही आज सर्वत्र ढ़िखलाई दे रहे हैं ! हा ! यह दृश्य वड़ा ही भयानक मालूम हो रहा है। इस हृदयद्रावक दृश्य से भारत-प्रेमियों का हृदय आज भीतर ही भीतर जल रहा है। जिनके ऊपर भारत का सच्चा उद्धार निर्भर है, जो कि भारत के मुख्य आशास्थल और आधारस्तम्भ हैं ऐसे नवजवानों को ऐसी पतित और शोकपूर्ण दशा में देख कर किस भारतपुत्र का हृदय दुख से हिल नहीं जाता ! हमें तो रुलाई आने लगती है।
प्रभो ! यह हमारा वड़ा ही भारी पतन हुआ है। जो भारत एक समय परमोच्च उन्नति का केन्द्र था, जिस भारतवर्ष में हजारों बलशाली और वीर्यशाली नरसिंह वास करते थे, जिसकी ओर कोई भी राष्ट्र आँख उठाकर नहीं देख सकता था, जो सम्पूर्ण विद्याओं में सब का गुरु था, जिसका प्रभाव सम्पूर्ण दुनिया पर पड़ा हुआ था, जिसके अंगुलिनिर्देश से सम्पूर्ण दिङ्-मण्डल काँप उठता था, वही भारत आज गुलामों का कैदखाना सा बन रहा है और सब तरह से पीसा, निचोड़ा और जलाया जा रहा है। हाय ! इससे बढ़कर पतन और कौनसा हो सकता है ? नहीं, हमको अब