ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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दूसरा आश्रम 'गृहस्थाश्रम' है। इसकी मर्यादा २५ से लेकर ५० वर्ष तक की निश्चित की गई है। इसमें धर्माचरण से चलकर केवल सु-प्रजा निर्माण करने की आज्ञा है, न कि कु-प्रजा।
तीसरा ५० से लेकर ७५ वर्ष तक 'वानप्रस्थाश्रम' है। इस अवस्था में अपनी स्त्री को माता तुल्य मान कर, उसके साथ विषय-रहित शुद्ध व्यवहार रखने की आवश्यकता है।
चौथा और अन्तिम 'सन्यासाश्रम' है, जिसमें कि सर्वसंग परित्याग कर आत्म-कल्याणार्थ एकान्त का आश्रय लेना पड़ता है और अहर्निश ब्रह्मचिन्तन करना पड़ता है, न कि विषय चिन्तन।
एक मात्र ज्ञानी और विरक्त पुरुष ही सन्यास का अधिकारी हो सकता है। मूर्ख व रोगी पुरुषों को सन्यासी होना पूर्ण लाञ्छना-स्पद और अवनतिप्रद है। मूर्ख पुरुष खास कर पेट के लिये ही बीच में सन्यासी बाबा बन जाते हैं। लेखक में ऐसे कई मूर्ख और दुराचारी सन्यासी और कई अधम वानप्रस्थाश्रमी अपनी आँखों देखे हैं और गृहस्थाश्रमियों को तो आप हम सब ही देख रहे हैं।
६ ब्रह्मचर्य और विद्यार्थी
ब्रह्मचर्याश्रम को विषयरूपी सुरङ्ग से उड़ाने वाले आज लाखों करोड़ों स्त्री-पुरुष समाज में जिधर देखो उधर चारों ओर दिखाई दे रहे हैं। जड़ काटने से जैसे पेड़ की स्थिति होती है, वैसे ही खराब और गिरी दशा ब्रह्मचर्यरूपी जड़ को काटने वाले गृहस्थाश्रमियों की हो गई है। “नष्टे मूले नैव शाखा न पत्रम्” इस न्याय