भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम है। मानों वह आश्रम सम्पूर्ण आश्रमों की नींव है और वास्तव में है भी ऐसा ही। ब्रह्मचर्याश्रम की मर्यादा उन्होंने पुरुष की २५ वर्ष की और स्त्री की १६ वर्ष की “पूर्ण दृष्टि” से निश्चित की है। इसमें तिल भर फर्क नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति इस नियम को तोड़े तो प्रकृति भी उस व्यक्ति को तोड़ डालती है। प्रकृति के नियम परम कठोर हैं; जो उन नियमों के अनुसार चलता है उसे वे अमृत के समान फल देने वाले होते हैं और जो उनका अतिक्रमण करता है उसे वे विपतुल्य संहारक बन जाते हैं। सद्गुणयोग करने से अग्नि जैसे परम उपकारी हो सकती है और दुर्गुणयोग करने से वही अग्नि जैसे महान विनाशक बन जाती है, ठीक यही न्याय प्रकृति के सम्पूर्ण नियमों का भी समन्वित है।

ब्रह्मचर्य दो प्रकार के हैं। एक “नैष्ठिक” और दूसरा “उपकुर्वाण” आजन्म ब्रह्मचारी को “नैष्ठिक” कहते हैं और गुरुगृह में यथायोग्य ब्रह्मचर्य पालन कर, विद्या प्राप्ति के अनन्तर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वाले ब्रह्मचारी को ‘उपकुर्वाण’ कहते हैं।

यदि कोई आजन्म-भरण ब्रह्मचर्यव्रत धारण करे तो फिर पूछना ही क्या? वह इस लोक में सचमुच देवता ही के तुल्य पूज्यनीय बन जाता है; ऐसे पुरुष बहुत कम हैं। उदाहरणार्थ:— श्री समर्थ रामदास स्वामी, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, वगैरह इसी उच्चश्रेणी के आदर्श ब्रह्मचारी महत्तमा हुये हैं जिनको आज संसार से पूजे जाते हुये हम आप प्रत्यक्ष देख रहे हैं।