ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ ब्रह्मचर्य व आश्रम चतुष्टय ❁
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होगा । हमें अपने पूर्वजों की तरह प्रत्यक्ष वीर्यवान और सामर्थ्यवान बनना होगा । आज भी हम भीमाजुन जैसे बली और धनुर्धारी अर्जुन बन सकते हैं प्रोफेसर माणिक राव, गामा, प्रो० एकनाथ मूांत और प्रो० शहा इस बात के आज जीते जागते दृष्टान्त हैं । हमारा भोजन हमी को खाना और पचाना पड़ता है । केवल भोजन की तरफ देखने से अथवा उसकी खुशबू से अथवा उसकी कोरी तारीफ से ही सिर्फ हमारा पेट कभी नहीं भर सकता; वैसे ही अपना, बल, तेज, सामर्थ्य, स्वातंत्र्य और वैभव भी हम ही को कमाना पड़ता है । पूर्वजों की कोरी तारीफ से कुछ भी नहीं हो सकता । यद्यपि आज हमारा बहुत कुछ पतन हुआ है, तो भी सदाचार द्वारा हम पुनः ब्रह्मचारी यानी वीर्यवान और बली हो सकते हैं । सैकड़ों प्रो० माणिकराव और सहस्रां प्रो० शहा इस भारत भूमि में पुनः निर्माण हो सकते हैं । याद रखो, केवल सदाचारी पुरुष ही ब्रह्मचारी और उन्नत हो सकते हैं न कि दुराचारी । व्यभिचारी पुरुष ! मुर्खाने हुये पेड़ जैसे पानी मिलने से पुनः सजीव और चैतन्यमय हो सकते हैं वैसे ही सदाचरण से हमारी सम्पूर्ण गुप्त शक्तियां खुल पड़ती हैं, और शक्तियां खुलते ही फिर हम अपने पूर्वजों की तरह अपना बल तेज व पराक्रम निश्चयपूर्वक सर्वत्र दिखाया सकते हैं ।
८—ब्रह्मचर्य व आश्रम चतुष्टय
हमारे शास्त्रकारों ने शास्त्रों में “प्रकृति के नियमानुसार” चार आश्रम निर्धारित किये हैं । उनमें से प्रथम और सब से