ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
काम का दमन
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मालूम होता है। जो वास्तव में विप है उसे अमृत समझना और जो प्रत्यक्ष अमृत है उसे विप समझना ये घोर पाप के लक्षण हैं। यह बात निःसन्देह सत्य है कि जिसे सांप काटता है उसको मिर्च भी तीत नहीं लगती और न नीम कड़वी लगती है परन्तु चीनी उसे बहुत ही कड़वी लगती है। ठीक यही हालत विषय रूपों सप से वंशित पुरुषों की भी समझिये। उन्हें सब उलटी ही बातें सूझती हैं और उनकी दृष्टि में सब पाप ही पाप भरा रहता है। वे सभी स्त्रियों की ओर पाप-दृष्टि से देखते हैं और इस प्रकार व्यर्थ पाप के भागी बन अन्त में नरक को जाते हैं। आज बड़े बड़े देवस्थानों में भी नाच रंग व व्यभिचार घुस गया है। कई मन्दिरों पर तो भद्दे भद्दे चित्र भी खुदे हुये हैं। हा ! पापी पुरुष क्या नहीं करेंगे ? गङ्गा जी में । तक डूबे रहने पर भी उनकी पाप दृष्टि नहीं जाती। देव-दर्शन के हाने मन्दिरों में और वायु सेवन के मिस से घाट पर तथा ज जगह कई गीध बैठे हुए नित्य दिखाई देते हैं। धिक्कार है, नारकी जीवों को !
अहो न हिरदय धस्यो, भयो पुण्य का नाश । मानों चिनगी आग की, परी पुरानी धास ॥ १ ॥ विविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥ २ ॥
भगवान् कहते हैं:—नरक के तीन प्रचण्ड महाद्वार रात दिन खुले हुए हैं। सब से पहला द्वार काम का है जिसमें कि विषय के गुलाम बलात् खींचे और दूसे जाते हैं। दूसरा द्वार क्रोधी पुरुषों के लिये है और तीसरा द्वार लोभियों के लिये है।
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ब्रह्मचर्य ही जीवन है
कामी पुरुष जीते जी ही नरक का अनुभव करने लगता है; वह जीते जी ही मुर्दा बन जाता है । जगद्गुरु श्री दत्तात्रेय मुनि कहते हैं:—“जो लोग गन्दगी से सदा भरे हुए मल मूत्र के स्थानों में रसमाण रहते हैं, ऐसे नारकी जीव नरक से क्यों कर तर सकते हैं ? ऐ पुरुषो ! तुम चर्ममयी नरक-कुंड की ओर क्यों ताकते हो ? क्या नरक के कीट बनने के लिए ? छीं छीं ! इससे तुम्हारा कैसे उद्धार होगा ? क्या यहीं स्वर्ग-सुख है । जरा तुमही सोचो कि यह स्वर्ग-भोग है या नरक-भोग ? इस प्रकार तो शूकर, कूकर और गोबर के कीड़े भी आनन्द मनाते हैं ! इनसे फिर तुम्हारा दर्जा ऊँचा कैसा ? ऊँचे दर्जे के लिये हमें अवश्य अपने आचार-विचार भी ऊँचे ही रखने चाहियें ! केवल मनुष्य की देह धारण कर लेने से कोई “मनुष्य” नहीं हो सकता । विद्या और विनय, तप व शान्ति, कान्ति व दान्ति ( लावण्य तथा दमन शक्ति ) गुण व अ-गर्व, धर्म व अदमम इत्यादि सद्गुणों से ही मनुष्य ‘मनुष्य’ बन सकता है और ईश्वरत्व को प्राप्त हो सकता है । परन्तु इन सब की जड़ एक मात्र ब्रह्मचर्य है, यह सत्य बात कभी न भूलो ।
कामान्ध मनुष्य तारुण्य के मद से विषय में प्रीति भले ही रखता हो और अपनी मनमानी भले ही करता हो; परन्तु वे ही विषय उसे आगे इस रीति से पटक देते हैं, जैसे पेड़ों को बाढ़ और आंधी ! बेचारा मोहवश विषय में फँस कर “सुख की बुद्धि” से स्त्री-संग करता है और अपने ही वीर्य का नाश कर अपने को धन्य व कृतार्थ समझता है; जैसे कुत्ता सूखी हड्डी को चबाते समय मुँह से निकले हुए खून को सूखी हड्डी से निकला हुआ समझ कर अपना ही खून चूस कर वह मूर्ख बड़ा खुश होता है; जैसे विच्छू
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या खटमल की शय्या कदापि सुखकर नहीं हो सकती, वैसे ही विषयी पुरुष भी कदापि सुखी नहीं हो सकते, वे सदा बेचैन बने रहते हैं। “दुःखी सदा को ? विपयानुरागी !” ऐसा श्रीमत् शङ्कराचार्य भी कहते हैं। सच है, सांप के फन के नीचे बैठे हुआ चूहा कब तक छाया का सुख मनावेगा ? मेढक, सांप द्वारा आधा निगले जाने पर भी जैसा वह मूर्ख मक्खियों के लिये मुँह खोलता है, वैसे ही कामी पुरुष भी अनेक रोगों से अधमरे होने पर भी विषय सेवन के लिये हाथ-पैर फैलाते ही हैं। गढ़ही के लातों से नाक-मुँह फूट जाने पर भी जैसे वह गढ़हा गढ़ही की आशा नहीं छोड़ता, उसके पीछे पीछे ही दौड़ता है; वैसी ही दुर्दशा काम के कीटों की भी होती है; वे सब तरह से नष्ट-भ्रष्ट व दुखी होने पर भी अपनी कुदुष्टि को नहीं त्यागते और विषय के पीछे मारे मारे फिरते हैं। दाढ़ को खुजलाने से जैसे वह कदापि शमन नहीं हो सकती, उसे वैसे ही छोड़ देने तथा स्नान व उपवास द्वारा शरीर की सफाई रखने ही से वह शान्त हो सकती है, वैसे ही काम के सेवन से काम की शान्ति कदापि नहीं हो सकती। ऐसा आज तक किसी ने न देखा और न सुना ही है। सांप को छेड़ने से नहीं किन्तु सांप से दूर रहने ही से जैसे हम बच सकते हैं; वैसे ही काम के सेवन से नहीं किन्तु काम से दूर रहने ही से काम की सच्ची शान्ति हो सकती है और हम भी पूरा शान्त व सुखी बन सकते हैं। यदि कोई नासारोगी सफेद मिट्टी के तेल को, पानी समझ कर, जलते हुए भोंपड़े पर डाले, तो कैसा उल्टा परिणाम होगा ? क्या कभी ईधन से अग्नि शान्त हो सकती है। कोई कहेगा, “हाँ, हो सकती है, ढेर
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सी लकड़ी डाल देने से आगी बुझ सकती है।” हम कहते हैं, “अधिक विषय सेवन करने से फिर तुम भी अकाल में बुझ जाओगे ! एक शराबी ने ऐसा ही किया । एक दिन उसने खूब शराब पी ली । नतीजा यह हुआ कि एक ही घंटे में उसकी दुर्बल बनी हुई खोपड़ी नशे के मारे फट गई और वह मर गया । यथाति राजा ने अपने पुत्र की भी आयु ली और तमाम उम्र भर उसने विषय-सेवन किया परन्तु उसकी शान्ति नहीं हुई । अन्त में वह चर्या बन गया, उसको क्षय हो गया । इसी कारण संत उपदेश करते हैं:—
( भजन ध्रुव-गजल की )
“विषयों से मन को तृप्त कराना नहीं अच्छा । जलती अगिनि को घी से बुझाना नहीं अच्छा ॥ १ ॥ सुख भोगते ये जगत् के सभी हैं नाशमान । तृष्णा बढ़ा के जी को फँसाना नहीं अच्छा ॥ २ ॥ है गच्छतीति* जगत् धाम दुःख का भारी । रंग रंग के खेल देख लुभाना नहीं अच्छा ॥ ३ ॥ “धन धाम इष्ट मित्र रूप नारि और पुत्र । हरगिज धमण्ड इनका न करना कभी अच्छा ॥ ४ ॥ ‘वामन’ है आयु वीततो अब से भी जरा चेत । दुर्लभ शरीर पाके गँवाना नहीं अच्छा ॥ ५ ॥ अतएव, प्यारे भाइयो ! जहाँ तक हो सके वहाँ तक, मनुष्य को
- जानेवाला किंवा बदलने वाला जगत् ।
काम का दमन
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चेकाम बनाने वाले इस दुर्भर यानी कभी भी त्रम न होने वाले महापैट्ट व पापी काम से सदा दूर रहा ! इसी में कल्याण है ।
‘यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णात्तय सुखस्यैते नाहृतः षोडशीं कलाम् ॥ १ ॥
अर्थात्, निष्कामता में यानी विषय वैराग्य में जो सुख भरा हुआ है उसका सोलहवाँ हिस्सा भी सुख संसार के व स्वर्ग के समस्त विषयों में तथा दिव्य ऐश्वर्यादि में नहीं है । अतः इस महाशनो महापाप्मा काम रिपु को “भगवान् के आज्ञानुसार” तुरंत मार डालो, नहीं तो वह दुष्ट तुम्हें ही मार डालेगा ! याद रखो ।
( भजन )
अनारी मन काम नरक को मूल ॥ १ ॥ रङ्ग रूप में रहो लुभाना, भूल गयो हरिनाम दिवाना । या यौवन का कौन ठिकाना, दो दिन में हो धूल ॥२॥ अमृत-भरे कलश बतलाये, धरि धरिके आनन्द मनावे । चमड़े की थैली है मूरख, जापै रहयो बड़ी फूल ॥३॥ ‘जा मुख को चन्दाकर मानो, थूक लार वामें लिपटानो । छी छी छी छी ! तुमारी मतिपर, विष्टा में गयो भूल ॥४॥ कैसा भारी धोका खाया, हाड़चाम पर मन ललचाया । ‘वामन’ इस पर गौर किया कुछ ? यही कालका मूल ॥५॥
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११—प्रकृति का स्वभाव
प्रकृति का स्वभाव अत्यन्त कठोर और दयालु है । वह अत्यन्त न्यायप्रिय है । न्याय में वह चूमा नहीं करना जानती । सदाचारियों के लिए प्रकृति परम प्यारी माता है और दुराचारियों के लिये वह पूरी राक्षसी है । वह स्वयं राक्षसी कदापि नहीं है । वह परम दयालु जगन्माता है । केवल दुराचारियों ही को वह राक्षसी जैसी प्रतीत होती है । परन्तु दण्ड में भी हमें सुधारने का ही उसका पवित्र हेतु होता है । ठोकर खाने ही से मनुष्य सावधान होता है ।
आज अत्यन्त वीर्यनाश के कारण तरुण समाज अत्यन्त नाशोन्मुख हो रहा है और दिन पर दिन रसातल को जा रहा है । चाहे तुम कितने ही अंधेरे में और कितने ही चालाकी से वीर्य-नाश करो और अपने को कितना ही सुरक्षित व बुद्धिमान समझो और कुकर्मों को छिपाने की कैसी ही कोशिश करो, परन्तु वीर्य-नाश होते ही मृत्यु तत्काल तुम्हारे द्वार पर आ डटती है और तुम्हारा इन्तजार करती है । प्रकृति माता अपने हाथ में डंडा लिये तुम्हारी वह नीच कृति देखती है तथा प्रत्येक वृद्ध के लिये तुम्हारे मर्म स्थानों पर कठोर डंडा प्रहार करती है । ज्यों ज्यों तुम वीर्यनाश करोगे त्यों त्यों वह तुम्हें मारते मारते वेदम व अधमरा कर डालेगी । तब भी यदि नहीं चेतोगे व सुधरोगे तब अन्त में तुम्हारा इन्तजार करती हुई मृत्यु की ओर तुम्हें, सड़े फल की तरह, फेंक देगी, तुम्हें उठा के नरककुण्ड में बिछा देगी !
आज कितने ही तरुणों के बदन पर हम उन डंडों की चोटों
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के गहरे निशान प्रतिदिन देख रहे हैं। कितने ही हतभागी लोग महारोगियों की तरह खटिया पर पड़े पड़े तड़फड़ा रहे हैं कोई गर्मी से पीड़ित है। कोई फिर भी, उन निशानों को लिये हुए समाज में इधर-उधर भूठे ही छाती निकाल कर ऐंठते हुए अकड़ कर घूम रहे हैं। कोई माला फेर रहे हैं और इधर नाड़ी भी टटोल रहे हैं और मन में राम का नहीं, किन्तु काम का जप कर रहे हैं। अब कहिये ऐसे लोगों की क्या गति होगी ? बेचारों की “इतो भ्रष्टस्तोभ्रष्टः” ऐसी ही त्रिशंकु की तरह दुर्गति होगी, और क्या ? दम्भाचार में न दीन है न दुनिया ही है।
“धंचक भक्त कहाय राम के ।
किंकर कंचन होय काम के ॥”
वहुत से बालक तो ऐसी दुर्गति को पहुंच गये हैं कि उन्हें भात तो क्या पर दूध तक नहीं पच सकता, पाखाना भी साफ नहीं होता। खाना तथा पाखाना में बड़ी ही दुर्दशा हो गई है। भोजन कर भी लिया तो पचता नहीं। इधर खाया और उधर निकल गया। यदि पचा भी तो उसका सार वीर्य शरीर में रहने नहीं पाता। रोज स्वप्रदोष अर्थात् धातुक्षय हुआ करता है। फिर छिपे छिपे वैद्यों की दूकान दृढ़ते हैं ! परन्तु उनको याद रहे कि वीर्यनाश करनेवाला यदि साक्षात् धन्वन्तरि ही क्यों न हो तथापि वह भी अपने को कदापि बचा नहीं सकता। फिर दूसरे वीर्यहीनों को वह कैसे बचा सकता है ? आजकल के डाक्टर वैद्य क्या धन्वन्तरि से भी ज्यादा बढ़ गये हैं ? हाँ ! लूटने मारने में वे अवश्य बड़े-चढ़े हुये हैं। किसी ने वैद्यों को “यमराज का भाई” कहा है, सो वहुत ही यथार्थ है। यम तो केवल प्राण ही हर लेता है पर वैद्य प्राण
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ॐ ब्रह्मचय ही जीवन है ॐ
और धन दोनों लूट लेते हैं। दवाओं से रोग “जड़” से अच्छे नहीं हो सकते। दवा से रोग थोड़ी देर के लिये दब सकते हैं सही, परन्तु कुछ अरसे के बाद वे दूसरी शक्ति में पैदा होते हैं। “मरण बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की” इसका यही प्रत्यक्ष प्रमाण है कि “ज्यों ज्यों डाक्टरों व वैद्यों की संख्या बढ़ती जाती है त्यों त्यों रोग और रोगियों की भी संख्या बढ़ती ही जाती है और इस बात को कोई जानना चाहता हो, तो वह अखबारों में दवाओं के विज्ञापनों को देख सकता है। प्यारे मित्रों, विदेशी लोग इन विज्ञापनों को देख कर दिलमें क्या सोचते होंगे ?
हम ही अपने डाक्टर हैं।
भाइयों ! लौटो ! प्रकृति माता की शरण में आओ। वह परम दयालु है। तुम्हारा जरूर सुधार करेगी। विश्वास रखो। प्रकृति माता की दया बिना कोई एक घण्टा भी नहीं जी सकता। नाक, कान, मुंह, मल, मूत्र, त्वचा इत्यादि द्वारा, बल्कि रोम रोम से, वह हमारे भीतर का संपूर्ण जहर हरदम बाहर निकाल कर फेंकती रहती है और हमें चंगा किया करती है। अतः हमें चाहिये कि प्रकृति के “पञ्चामृत” का अर्थात् शुद्ध हवा, प्रकाश, पानी, भूमि व आकाश ( Space ) इनका रोज यथेष्ट पान करें और कुकर्मों को त्याग कर सुकर्मों द्वारा अपना पुनरुद्धार कर लें। हमारा उद्धार हमारे ही हाथ में हैं। वस्तुतः हम ही अपने डाक्टर हैं, गुरु हैं।
पद—( राग—असावरी )
“कर्मों का फल पाना होगा । धृ० ॥
“क्यों न अरे तू चेत में आवे,
सभी ठाट तज जाना होगा।
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विषय भोग से सभी तरह बच, बचा न तो सङ्ग जाना होगा ॥ १ ॥ “सुर-दुर्लभ-तनु भोगी श्वानवत्, क्या श्व अब कहलाना होगा । धर्माधर्म कङ्कू नहीं मान्यो, कर्म-दण्ड यही पाना होगा ॥२॥ अन्त समय परे मन मूरख ! जड़ल तेरा ठिकाना होगा । कुछ इस जग में कीर्ति कमा ले, धर्महि ले साथ जाना होगा ॥३॥ “भूलि गयो कर्तव्य आपनो, देख बहुत पछताना होगा । आँखे रहते अन्धो मत बन, शुभ विवेक से तरना होगा ॥ ४ ॥ “जैसा जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल खाना होगा । अब भी ‘वामन’ चेत में आजा, नहीं तो दुर्गति पाना होगा ॥ ५ ॥ “गतं न शोच्यं ।”
“बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेई ।”
सचमुच हमको अब जरूर सम्हलना होगा । जलते हुए मकान से बाहर निकल आने में ही बुद्धिमान्नी है; उसी में जिन्दगी है । यदि हम अपना कल्याण चाहते हैं तो महापुरुषों के सद्गुपदेशानुसार हमको तन-मन-धन से शीघ्रतया जरूर चलना होगा । माता
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन ❁
पिता अथवा गुरु यदि अधर्ममयी आशा करते हैं तो उनकी वह आशा भ्रुव प्रह्लाद, शुक्र, आदि की तरह कदापि न मानो। भीष्मपितामह ने अपने ब्रह्मचर्य के भंग करने की गुरु की अनुचित आशा बिल्कुल नहीं मानी; तब गुरु शिष्य में युद्ध छिड़ा। अन्त में परशुराम जी को उस महान् प्रतापी अखण्ड ब्रह्मचारी धर्मप्रतिज्ञ भीष्म के सामने हार माननी ही पड़ी। अहा ! क्या ही यह ब्रह्मचर्य का प्रताप है ? हमको भी अपने ब्रह्मचर्य के पालन में अब ऐसा ही दृढ़प्रतिज्ञ होना चाहिये।
“धैर्यं न टूटै पड़े चोट सौ घन की । यही दशा होना चाहिये निज मन की ॥”
सबमुच ‘हृदय से’ चाहने वालों को जैसी बुराई सहल है, वैसी भलाई भी सहल है। अतएव मनुष्य को चाहिये कि वह अपने दुष्ट मन को हठपूर्वक या विवेकपूर्वक विषय से हटावे। बुराई एकाएक दूर नहीं हो सकती यह बात सच है परन्तु “पुरुषस्य प्रयत्न शीलस्य असाध्यं नास्ति।” पुरुषार्थी पुरुष के लिये संसार में कुछ भी असाध्य व अशक्य नहीं है। हृदय से उचित प्रयत्न करने पर सब कुछ सरल है। अभ्यास से असाध्य भी साध्य हो जाता है। बड़े बड़े अफीमची और शराबी भी अपनी मात्रा को थोड़ी थोड़ी घटाते घटाते अन्त में व्यसन-मुक्त हो गये हैं, इस बात को कभी न भूलो। वैसे ही हम भी सुधर सकते हैं।
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१२—मन व इन्द्रियाँ
रहे शान्त जो युवा मैं , शान्त धीर वह वीर । नष्ट हुए पर वीर्य के, का न बने गम्भीर ? ॥ १ ॥
सच्चा कुशल सारथी वही है जो उन्मत्त घोड़ों को अपनी क़ाबू में रखता है; उन्हें उच्छृङ्खल नहीं होने देता । वैसे ही सच्चा वीर पुरुष वही है जो कि युवावस्था में भी प्रबल इन्द्रियों को अपने अधीन रखता है; उन्हें स्वतंत्र व स्वेच्छाचारी नहीं होने देता । शत्रुओं पर और संपूर्ण राजाओं पर विजय प्राप्त करने वाला सच्चा शूर नहीं कहा जा सकता । सच्चा शूर वही है जो मन और इन्द्रियों का स्वामी है और मन तथा इन्द्रियों पर केवल महापुरुष ही अधिकार चला सकते हैं और कोई भी मनुष्य यदि सदुपदेशों के अनुसार मन-क्रम-वचन से चले तो महापुरुष हो सकता है । इसमें कुछ भी कठिनता नहीं है । मैला कपड़ा जैसे पुनः साफ़ हो सकता है । वैसे ही विषय व दुर्धर्षन से गन्दा बना हुआ मन भी पुनः साफ़ हो सकता है । परन्तु अटल निश्चय व पूरी दृढ़ता होनीचाहिये । पवित्र मन माता, पिता, गुरु व मित्रों से भी अधिक उपकारी है; मन ही मनुष्य को नरक में फेंकता है और मन ही मनुष्य को नरकमें से निकाल कर ऊँचे पद पर पहुँचाता है; मन ही सुख दुःख का असली कारण है; मन ही स्वर्ग व नरक, वंध्य व मोक्ष का प्रदाता है,—ऐसा भगवान् श्री कृष्णचन्द्र का वचन है । अतः मन को इक्ष्वाकु में रखो । मन बड़ा दगा-बाज़ है । मन के वायदे को कभी न मानो । “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।” यह अटल सिद्धान्त जानो । मन को न
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
बाँधोगे तो मन तुमको जहाँ चाहे वहाँ पटक देगा, यह निश्चय सम्भो । क्या आपको इसका अनुभव नहीं है ? “आत्मोद्धार कैसे हो ?” इस पर सन्त कहते हैं “मन की कथनी से उलटी रीति पर चलो—उलटी चाल चलो । मन का गुलाम सब का गुलाम है । वह पंडित होने पर भी महामूर्ख है, बलवान होने पर भी महान दुर्बल है और राजा होने पर भी पूरा दुखी, अभागा और मिखारी है ।” मन का स्वामी ही सम्पूर्ण जगत् का स्वामी है, चाहे वह शरीर से भले ही दुर्बल हो । श्रीगोस्वामो जी कहते हैं:—
काम कोष मद लोभ की, जब लग मन में खान ।
तुलसी परिडित मूरखो, दोनों एक समानं ॥ १ ॥
अतः हमें चाहिये कि इस अन्ध में दिये हुये सरल, श्रेष्ठ व अमूल्य नियमों द्वारा अपने मन को स्वाधीन कर ब्रह्मचर्य का सच्चा पालन करें तथा अपना सच्चा उद्धार कर लें ।
१३—वीर्य की उत्पत्ति
“रसाद्रकं ततो मांसम् मासान्मेदः प्रजायते ।
मेदस्याऽस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्लसंभवः ॥
—श्रीशुश्रुताचार्य
मनुष्य जो कुछ भोजन करता है, वह प्रथम पेट में आकर पचने लगता है और उसका रस बनता है; उस रस का पांच दिन तक पाचन होकर उससे रक्त पैदा होता है; रक्त का भी पांच दिन तक पाचन होता है और उससे मांस बनता है । पाचन की यह क्रिया एक सेकण्ड भी बन्द नहीं रहती । एक को पचा कर
❁ वीर्य की उत्पत्ति ❁
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दूसरा, दूसरे से तीसरा, तीसरे से चौथा ऐसा एक से एक सार पदार्थ तैयार हुआ करता है और प्रत्येक क्रिया में फजूल चीजें मल; मूल, पसीना, आँख, कान व नाक का मैल, नाखून, केशादिक के रूप में बाहर निकल जाती हैं । इसी प्रकार पाँच दिन के बाद मेदा से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से सप्तम सार पदार्थ “वीर्य” बनता है । फिर उसका पाचन नहीं हो सकता । यही “वीर्य फिर ओजस्” रूप में संपूर्ण शरीर में चमकता रहता है । स्त्री के इस सप्तम शुद्धाति शुद्ध सार पदार्थ को “रज” कहते हैं । दोनों में भिन्नता होती है । वीर्य काँच की तरह चिकना और सफेद होता है और रज लाख की तरह लाल होता है । अस्तु । इस प्रकार रस से लेकर वीर्य वा रज तक छः धातुओं के पाचन करने में पाँच दिन के हिसाब से पूरे ३० दिन व क़रीब ४ घण्टे लगते हैं, ऐसा आर्य शास्त्रों का सिद्धान्त है । ❁
यह वीर्य वा रज कोई खास जगह में नहीं रहता । संपूर्ण शरीर ही इसका निवास स्थान है । वादाम या तिल में जैसे तेल, दूध में जैसे मक्खन, किसमिस व ईख में जैसी मिठास, काठ में जैसी अग्नि किंवा फूल में अथवा चन्दन में जैसे सुगन्ध सर्वत्र कण कण में भरी रहती है; उसी तरह वीर्य भी शरीर के प्रत्येक अणु परमाणु में भरा हुआ है । वीर्य का एक बूँद भी निकलना मानो अपने शरीर को नींबू की तरह निचोड़ ही डालना है ।
- धातौ रसादौ मज्जान्ते प्रत्येकं क्रमतो रसः ।
अहो रात्रात्स्वयं पंच सादृं दण्डं च तिष्ठति ॥ इति भोजः ।
अर्थ—रस से मज्जान्त पर्यन्त प्रत्येक धातु पाँच दिन रात व ढेढ़ घड़ी तक रहती है । ( ढाई घड़ी का एक घन्टा होता है )
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जैसे मथने से दूध के प्रत्येक परमाणु से भस्मखन खींचा जाता है उसी प्रकार पूर्वोक्त नवधा मैथुन द्वारा शरीर के समस्त परमाणुओं से वीर्य खींचा जाता है। उस समय शरीर की तमाम नसें हिल जाती हैं; और शरीर के प्रत्येक अवयवों को रेल की तरह बड़ा भारी धक्का पहुँचता है।
हस्त-मैथुन❁ और प्रत्यक्ष मैथुन को छोड़ अन्य सप्त-मैथुनों द्वारा जो वीर्य शरीर से पसीज कर भीतर पतन होता है वह अखण्ड-कोप में आ ठहरता है। यह पतित वीर्य पदच्युत व कैंदी राजा की तरह हतबल व तेजोहीन बन जाता है। वीर्य का पतन होते ही शरीर भी उसी क्षण निर्बल, निस्तेज, दुःखी व अल्पायु बन जाता है। जब तक तेल ऊपर चढ़ता है तभी तक दीपक की ज्योति प्रकाश फैलाती रहती है और ज्यों ज्यों तेल का नाश होता जाता है त्यों त्यों वह मन्द होते होते अन्त में बुभुक्षु जाता है। वैसे ही जब तक वीर्य ऊपर चढ़ता रहता है तभी तक शरीर में चमक-दमक, उत्साह आनन्द व बल दिखाई देता है और ज्यों ज्यों वह नीचे उतर कर नष्ट होने लगता है त्यों त्यों चमक-दमक, उत्साह आनन्द बल और आयु सभी धीमे पड़ जाते हैं और अन्त में जीवन-दीप भी बुभुक्षु जाता है—जीवन का सर्वनाश होता है।
वीर्य के ऊपर चढ़ने ही को शास्त्र में ऊर्ध्व-रेता कहते हैं और पतन को अधःरेता। अखण्ड ब्रह्मचारी में और जिसका एक भरतवे भी वीर्य पतन हुआ हो—इन दोनों में बहुत ही फर्क होता
*पाठकों को स्मरण होगा कि ‘हस्तमैथुन’ में हमने वीर्यनाश के सभी अ-प्राकृतिक साधन समाविष्ट किये हैं।
❁ वीर्य की उत्पत्ति ❁
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है। ऐसे पुरुष की ऊर्ध्व रेता बनने की दैवी शक्ति बहुत कुछ नष्ट हो जाती है तथा उसका अधःपात होता है। और यह बात, एक ही मरतबे के वीर्यनाश से विश्वामित्र का कितना भयङ्कर पतन हुआ, इस उदाहरण से भली भांति सिद्ध होती है। वीर्य का पतन होते ही मनुष्य का भी पतन तत्काल होता है। उस की संपूर्ण शक्तियों का ह्रास होने लगता है। ज्यों ज्यों वीर्य का नाश होगा त्यों त्यों जीवन का भी अवश्य नाश होगा और ज्यों ज्यों वीर्य धारण किया जायगा त्यों त्यों जीवन का भी तारण होगा और मनुष्य बहुत उम्र तक जीवित रहेगा। ब्रह्मचर्य ही से मनुष्य सौ वर्ष तक जीवित रह सकता है और उसमें दैवी शक्तियाँ प्रगट हो सकती हैं।
अब यह जानना अत्यावश्यक है कि कितने भोजन से कितना वीर्य पैदा होता है। इसका निश्चय वैज्ञानिकों ने इस प्रकार किया है कि एक मनुष्य यानी ५४० सेर खुराक से ५१ सेर रुधिर बनता है और ५१ सेर रुधिर से दो तोला वीर्य बनता है, यानी “एक तोला वीर्य के बराबर चालीस तोला किंवा आध सेर खून” यह उन का सिद्धान्त है।
यदि निरोग मनुष्य सेर भर खुराक रोज खावे तो ४० सेर खुराक ४० दिन में खावेगा। अतः यह सिद्ध हुआ कि चालीस दिन की कमाई दो तोला वीर्य है। इस हिसाब से ३० दिन की अर्थात् एक महीने को डेढ़ तोला हुई।
वीर्य का नाश
एक बार में मनुष्य का वीर्य डेढ़ तोला से कम क्या निकलता होगा ? जो कि ३० दिन की कमाई है। अब जरा विचारने की
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ब्रह्मचर्य ही जीवन है
बात है कि इतने कठोर परिश्रम से तीस दिन में प्राप्त होने वाली देढ़ तोला अमूल्य व अतुल्य दौलत एक क्षण ही में फूँक डालना कितनी घोर मूर्खता है ? यह किवना घोर पतन है ? ऐसा पुरुष उस मूर्ख वागवान के समान है, जो तन, मन, धन से दिन-रात परिश्रम कर फूलों का सुन्दर वारा तैयार करता है और पैदा हुए असंख्य फूलों का इत्र निकलवा कर उसे मोरियों में डालता वा डलवाता है । आमदनी एक रुपया की खर्च तीस रुपयों का ऐसा जितना अन्धा, मूर्ख, पागल और भिखारी है, उससे करोड़ गुना वह मनुष्य मूर्ख, पागल, अन्धा, भिखारी, रोगी, दुःखी, अभाग्य और काल का शिकार है जो एक महीने से कहीं ज्यादा की वीर्य-सम्पदा एक दिन में खाक कर डालता है । एक मरतबे के वीर्यनाश से ही यदि मनुष्य की महा दुर्दशा होती है तब रोज दो-दो तीन मरतबे अथवा चौधे, आठवे दिन वीर्यनाश करने वाले फिर अति शीघ्र नष्ट होंगे इसमें संदेह ही क्या है ? अतः जिन्हें 'दीर्घायु व सुखी बनना है, उन्हें' महीने में एक मरतबे से अधिक अथवा श्रीमनु महाराज के आज्ञानुसार 'ऋतुकाल' का सच्चा अर्थ समझ कर महीने में दो मरतबे से अधिक तो, कभी भी वीर्यनाश न करना चाहिये । नहीं तो उलटा अपना ही नाश हो जायगा, यह बात याद रखो ।
ग्रीस ( यूनान ) के महा ज्ञानी तत्ववेत्ता साक्रेटीज़ ( सुकरात ) से किसी ने पूछा कि "छो प्रसंग कितने मरतबे करना चाहिये ?" उत्तर मिला कि "जन्म भर में एक बार !" फिर पूछा "यदि इतने से शान्ति न हुई तो ?" "अच्छा, फिर साल भर में एक बार करे ।" "उतने से भी मन न माने तो ?" "अच्छा फिर मास
❁ वीर्य की उत्पत्ति ❁
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भर में एक बार करें” “इतने पर भी न रहा जाय तो ?” अच्छा फिर एक मास में दो बार कर सकते हो; परन्तु जल्दी मृत्यु होगी ?” “इतने पर भी शान्ति न मिली तो ?” अच्छा तो, फिर ऐसा करे कि अपने कफन का सब सामान लाकर घर में पहले रख दें और फिर जैसा दिल में आवै वैसा किया करें ! क्योंकि न मालूम किस समय उसकी मौत आ जावे और उसे खा डाले !”
रति-प्रसंग में अनेकों के अनेक मत हैं। चाहे कितना ही मत-भेद क्यों न हो परन्तु सार बात यह है कि वीर्यनाश जितना ही कम किया जायगा उतना ही स्वास्थ्य अधिक अच्छा होगा और मनुष्य दीर्घायु रहेगा, यह मत सभी को मान्य है। जितना ही अधिक विषय का सेवन किया जाता है उतना ही मन अधिक अशान्त, मलीन, पतित व दुःखी हो जाता है। वह तब ही शान्त हो सकता है जब वह या तो धर्म के अथवा प्रकृति के नियमानुसार चले किंवा मिट्टी में मिल जाय !
सब के सब ब्रह्मचारी
कोई कह सकता है “सभी लोग ब्रह्मचारी बन जायँ तो फिर स्मृति चलेगी कैसे” ? हम कहते हैं—“भित्रो ! स्मृति चलाने की फिक आप न करें। स्मृति का चलाने वाला निराला ही है। केवल आपही अपनी फिक करो और विषय के कारण अकाल में नष्ट-भ्रष्ट न बनो ! ब्रह्मचर्य से स्मृति नष्ट तो नहीं किन्तु मुक्त अवश्यमेव हो सकती है। क्योंकि ब्रह्मचर्य ही आत्मोद्धार का तथा विश्वोद्धार का सच्चा रहस्य है। अखण्ड वीर्यधारण तथा शाश्वत विषय सेवन का नाम ही ब्रह्मचर्य है। वस्तुतः ‘ब्रह्मचर्य से स्मृति
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
नष्ट होगी' ऐसी शंका करता ही व्यर्थ व मूर्खतापूर्ण है। प्रकृति शान्त होते हुए भी 'अनन्त है वस इसी एक वाक्य में इस प्रश्न का मुँह-तोड़ उत्तर है। हमारे ब्रह्मचारी होने से अनन्त अर्थात् अन्त-रहित प्रकृति का अन्त कदापि नहीं हो सकता, यह बात हमें कभी न भूलनी चाहिए। अतः मित्रो ! प्रथम अपने ही उद्धार की कोशिश करो। क्योंकि आत्मोद्धार ही लोकोद्धार है। यदि ऐसा न करोगे तो तुम्हारी चमगीदड़ की भांति उल्टी स्थिति होगी, निश्चय जानो।
१४—गृहस्थी में ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्यं समाप्याय गृहधर्मं समाचरेत्।
ऋणश्रय विमुक्त्यर्थं धर्मणोत्पादयेत् प्रजाम् ॥ १ ॥
ब्रह्मचर्य की अवस्था पूर्ण होने के बाद पत्नीस, वर्ष की युवावस्था में गृहस्थ धर्म को स्वीकार करे और ऋणश्रय विमुक्त्यर्थ ( देव-ऋण, ऋषि-ऋण व पितृ-ऋण इनसे छुटकारा पाने के हेतु ) धर्म की विधि से सुप्रजा निर्माण करे, न कि कुप्रजा।
शास्त्रों में हमारे आचार्यों ने प्रकृति के नियमानुसार ब्रह्मचर्य के नियम पहले ही से बाँध रखे हैं। प्रकृति के नियमों के तोड़ने से किसी का भला नहीं हो सकता। यदि उन नियमों के अनुसार चले तो मनुष्य स्त्री के रहते हुए भी ब्रह्मचारी हो सकता है। अखण्ड ब्रह्मचारी में और गृहस्थ-ब्रह्मचारी में यद्यपि बहुत फर्क होता है, तब भी धर्म-नियम के अनुसार चलने वाला गृहस्थ-ब्रह्मचारी भी महान् तेजस्वी, ओजस्वी, यशस्वी, मनस्वी अर्थात् मनोनिग्रही व सामर्थ्य-सम्पन्न होता है। जिस स्थान में सच्चा
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ब्रह्मचारी पहुँच सकता है उसी स्थान में सच्चा गृहस्थ भी जा सकता है। परन्तु आज सच्चे गृहस्थ ब्रह्मचारी भारत में कितने होंगे ? बहुत ही कम ! यह नितान्त सत्य है कि सच्चे गृहस्थ ब्रह्मचारी के न होने से ही भारत गारत हो रहा है; घर घर में कुसन्तान फैल गई है, जो कि १२ वर्ष की उम्र के बाद ही अपने ब्रह्मचर्य का सत्यानाश करने में प्रवृत्ति होती है। स्वयं माता-पिता ही अपने कन्या-पुत्रों के ब्रह्मचर्य के नाश का बाल-विवाहद्वारा खुल्लमखुल्ला यथेष्ट प्रबन्ध कर रहे हैं। भला ऐसे नादानों से, खुद उन्हीं की नहीं, तो देश के भलाई की आशा कैसे की जा सकती है ? जो प्रकृति के नियमों को पैरों के तले कुचलता है, उसे प्रकृति भी कठोरता से कुचल डालती है। बहुत से विवाहित पुरुषों का ख्याल है कि अपनी धर्मपत्नी के साथ महीने में चाहे जब, हफ्ते में कोई भी दिन और रात में चाहे जितने मरतबे, कितने ही काल तक, विषयोपभोग करना विलकुल शास्त्र-संगत और ईश्वरीय आज्ञा के अनुसार है; उसमें कुछ भी पाप या अधर्म नहीं है और न उसमें कुछ हानि ही होती है। परन्तु यह ख्याल अत्यन्त गलत और महा नाशकारी है। भाइयो ! जरा प्रकृति की ओर तो देखो ? पशुओं की अपेक्षा मनुष्य कितना बलहीन है ? तथा पशुओं का जननेन्द्रिय सामर्थ्य कितना अल्प व नियमित है ? इस पर से मनुष्यों को, जो कि घोड़ा, बैल, हाथी, सिंहदिकों से कम शारीरिक सामर्थ्य रखता है, कितना अत्यल्प व अत्यन्त नियमित विषय सेवन करना चाहिये, इसका आप ही हिसाव लगाइये ! सच कहा जाय तो मनमाना विषय सेवन करने वाला पशुओं से भी गया बीता है। ऋषियों का सिद्धान्त है कि:—
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
ऋतावृतौ स्वदारेषु संगतिर्या विधानतः । ब्रह्मचर्यतदेवोक्तं गृहस्थाश्रमवासिनाम् ॥
—श्रीयाक्षवल्क्ष्य
“ऋतुकाल में अपनी स्त्री से ( धर्मपत्नी से ) विधियुक्त अर्थात् शाखाज्ञानुसार केवल सन्तान के हेतु समागम करने वाला पुरुष, गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी, ब्रह्मचारी ही है ।” ‘सन्तानार्थं च मैथुनम्’ यह स्पष्ट व सख शाखाज्ञा है, याद रखो । श्री मनुमहाराज कहते हैं—“मास में ऋतुकाल में केवल दो ही रात्रि में जो धर्म-शाखाज्ञानुसार स्त्री-सेवन करता है वह धर्मात्मा पुरुष स्त्री रहते हुए भी ब्रह्मचारी है ।”
इसमें का “ऋतुकालः” यह शब्द अत्यन्त महत्व का है । ऋतुकाल का मतलब स्त्री के रजोदर्शन काल का चौथा ही दिन नहीं है उस दिन यदि शिवरात्री एकादशी अथवा नवरात्र आया
- ऋतुकाल का सच्चा अर्थ जानना हो और घर में ‘होरे’ निर्माण करने हों तो लेखक को “मन-यांचिद्धत सन्तति” नामक अत्यन्त महत्व पूर्ण करीब ४०० पृष्ठों को मौलिक किताब जरूर पढ़ो, मनन करो व आचरण में लाओ । इसमें का एक एक नियम लाख लाख रुपयों का है । किताब हृदय में ही रखने योग्य है । एक हजार आर्डर्स आने पर छपवाना शुरू कर देंगे । मूल्य दो रुपया रहेगा । किताब में लगभग सात आठ सुन्दर चित्र भी रहेंगे ।
आर्डर भेजने का मुख्य पताः—
मैनेजर, राष्ट्रोद्धार-कार्यालय,
बड़ौदा
( BARODA )