भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य ही जीवन है

बात है कि इतने कठोर परिश्रम से तीस दिन में प्राप्त होने वाली देढ़ तोला अमूल्य व अतुल्य दौलत एक क्षण ही में फूँक डालना कितनी घोर मूर्खता है ? यह किवना घोर पतन है ? ऐसा पुरुष उस मूर्ख वागवान के समान है, जो तन, मन, धन से दिन-रात परिश्रम कर फूलों का सुन्दर वारा तैयार करता है और पैदा हुए असंख्य फूलों का इत्र निकलवा कर उसे मोरियों में डालता वा डलवाता है । आमदनी एक रुपया की खर्च तीस रुपयों का ऐसा जितना अन्धा, मूर्ख, पागल और भिखारी है, उससे करोड़ गुना वह मनुष्य मूर्ख, पागल, अन्धा, भिखारी, रोगी, दुःखी, अभाग्य और काल का शिकार है जो एक महीने से कहीं ज्यादा की वीर्य-सम्पदा एक दिन में खाक कर डालता है । एक मरतबे के वीर्यनाश से ही यदि मनुष्य की महा दुर्दशा होती है तब रोज दो-दो तीन मरतबे अथवा चौधे, आठवे दिन वीर्यनाश करने वाले फिर अति शीघ्र नष्ट होंगे इसमें संदेह ही क्या है ? अतः जिन्हें 'दीर्घायु व सुखी बनना है, उन्हें' महीने में एक मरतबे से अधिक अथवा श्रीमनु महाराज के आज्ञानुसार 'ऋतुकाल' का सच्चा अर्थ समझ कर महीने में दो मरतबे से अधिक तो, कभी भी वीर्यनाश न करना चाहिये । नहीं तो उलटा अपना ही नाश हो जायगा, यह बात याद रखो ।

ग्रीस ( यूनान ) के महा ज्ञानी तत्ववेत्ता साक्रेटीज़ ( सुकरात ) से किसी ने पूछा कि "छो प्रसंग कितने मरतबे करना चाहिये ?" उत्तर मिला कि "जन्म भर में एक बार !" फिर पूछा "यदि इतने से शान्ति न हुई तो ?" "अच्छा, फिर साल भर में एक बार करे ।" "उतने से भी मन न माने तो ?" "अच्छा फिर मास