ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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है। ऐसे पुरुष की ऊर्ध्व रेता बनने की दैवी शक्ति बहुत कुछ नष्ट हो जाती है तथा उसका अधःपात होता है। और यह बात, एक ही मरतबे के वीर्यनाश से विश्वामित्र का कितना भयङ्कर पतन हुआ, इस उदाहरण से भली भांति सिद्ध होती है। वीर्य का पतन होते ही मनुष्य का भी पतन तत्काल होता है। उस की संपूर्ण शक्तियों का ह्रास होने लगता है। ज्यों ज्यों वीर्य का नाश होगा त्यों त्यों जीवन का भी अवश्य नाश होगा और ज्यों ज्यों वीर्य धारण किया जायगा त्यों त्यों जीवन का भी तारण होगा और मनुष्य बहुत उम्र तक जीवित रहेगा। ब्रह्मचर्य ही से मनुष्य सौ वर्ष तक जीवित रह सकता है और उसमें दैवी शक्तियाँ प्रगट हो सकती हैं।
अब यह जानना अत्यावश्यक है कि कितने भोजन से कितना वीर्य पैदा होता है। इसका निश्चय वैज्ञानिकों ने इस प्रकार किया है कि एक मनुष्य यानी ५४० सेर खुराक से ५१ सेर रुधिर बनता है और ५१ सेर रुधिर से दो तोला वीर्य बनता है, यानी “एक तोला वीर्य के बराबर चालीस तोला किंवा आध सेर खून” यह उन का सिद्धान्त है।
यदि निरोग मनुष्य सेर भर खुराक रोज खावे तो ४० सेर खुराक ४० दिन में खावेगा। अतः यह सिद्ध हुआ कि चालीस दिन की कमाई दो तोला वीर्य है। इस हिसाब से ३० दिन की अर्थात् एक महीने को डेढ़ तोला हुई।
वीर्य का नाश
एक बार में मनुष्य का वीर्य डेढ़ तोला से कम क्या निकलता होगा ? जो कि ३० दिन की कमाई है। अब जरा विचारने की