ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
जैसे मथने से दूध के प्रत्येक परमाणु से भस्मखन खींचा जाता है उसी प्रकार पूर्वोक्त नवधा मैथुन द्वारा शरीर के समस्त परमाणुओं से वीर्य खींचा जाता है। उस समय शरीर की तमाम नसें हिल जाती हैं; और शरीर के प्रत्येक अवयवों को रेल की तरह बड़ा भारी धक्का पहुँचता है।
हस्त-मैथुन❁ और प्रत्यक्ष मैथुन को छोड़ अन्य सप्त-मैथुनों द्वारा जो वीर्य शरीर से पसीज कर भीतर पतन होता है वह अखण्ड-कोप में आ ठहरता है। यह पतित वीर्य पदच्युत व कैंदी राजा की तरह हतबल व तेजोहीन बन जाता है। वीर्य का पतन होते ही शरीर भी उसी क्षण निर्बल, निस्तेज, दुःखी व अल्पायु बन जाता है। जब तक तेल ऊपर चढ़ता है तभी तक दीपक की ज्योति प्रकाश फैलाती रहती है और ज्यों ज्यों तेल का नाश होता जाता है त्यों त्यों वह मन्द होते होते अन्त में बुभुक्षु जाता है। वैसे ही जब तक वीर्य ऊपर चढ़ता रहता है तभी तक शरीर में चमक-दमक, उत्साह आनन्द व बल दिखाई देता है और ज्यों ज्यों वह नीचे उतर कर नष्ट होने लगता है त्यों त्यों चमक-दमक, उत्साह आनन्द बल और आयु सभी धीमे पड़ जाते हैं और अन्त में जीवन-दीप भी बुभुक्षु जाता है—जीवन का सर्वनाश होता है।
वीर्य के ऊपर चढ़ने ही को शास्त्र में ऊर्ध्व-रेता कहते हैं और पतन को अधःरेता। अखण्ड ब्रह्मचारी में और जिसका एक भरतवे भी वीर्य पतन हुआ हो—इन दोनों में बहुत ही फर्क होता
*पाठकों को स्मरण होगा कि ‘हस्तमैथुन’ में हमने वीर्यनाश के सभी अ-प्राकृतिक साधन समाविष्ट किये हैं।