भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ वीर्य की उत्पत्ति ❁

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दूसरा, दूसरे से तीसरा, तीसरे से चौथा ऐसा एक से एक सार पदार्थ तैयार हुआ करता है और प्रत्येक क्रिया में फजूल चीजें मल; मूल, पसीना, आँख, कान व नाक का मैल, नाखून, केशादिक के रूप में बाहर निकल जाती हैं । इसी प्रकार पाँच दिन के बाद मेदा से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से सप्तम सार पदार्थ “वीर्य” बनता है । फिर उसका पाचन नहीं हो सकता । यही “वीर्य फिर ओजस्” रूप में संपूर्ण शरीर में चमकता रहता है । स्त्री के इस सप्तम शुद्धाति शुद्ध सार पदार्थ को “रज” कहते हैं । दोनों में भिन्नता होती है । वीर्य काँच की तरह चिकना और सफेद होता है और रज लाख की तरह लाल होता है । अस्तु । इस प्रकार रस से लेकर वीर्य वा रज तक छः धातुओं के पाचन करने में पाँच दिन के हिसाब से पूरे ३० दिन व क़रीब ४ घण्टे लगते हैं, ऐसा आर्य शास्त्रों का सिद्धान्त है । ❁

यह वीर्य वा रज कोई खास जगह में नहीं रहता । संपूर्ण शरीर ही इसका निवास स्थान है । वादाम या तिल में जैसे तेल, दूध में जैसे मक्खन, किसमिस व ईख में जैसी मिठास, काठ में जैसी अग्नि किंवा फूल में अथवा चन्दन में जैसे सुगन्ध सर्वत्र कण कण में भरी रहती है; उसी तरह वीर्य भी शरीर के प्रत्येक अणु परमाणु में भरा हुआ है । वीर्य का एक बूँद भी निकलना मानो अपने शरीर को नींबू की तरह निचोड़ ही डालना है ।

  • धातौ रसादौ मज्जान्ते प्रत्येकं क्रमतो रसः ।

अहो रात्रात्स्वयं पंच सादृं दण्डं च तिष्ठति ॥ इति भोजः ।

अर्थ—रस से मज्जान्त पर्यन्त प्रत्येक धातु पाँच दिन रात व ढेढ़ घड़ी तक रहती है । ( ढाई घड़ी का एक घन्टा होता है )